ज्योतिष डेस्क | पितृ पक्ष में पूर्वजों के लिए श्राद्ध और तर्पण करते समय सिर्फ तिथि ही नहीं… समय का भी विशेष ध्यान रखा जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दिन में एक विशेष अवधि पितरों के निमित्त किए जाने वाले कर्मों के लिए महत्वपूर्ण मानी गई है. इसे कुतुप काल कहा जाता है. मान्यता है कि इस समय विधि- विधान से किया गया श्राद्ध पितरों को प्राप्त होता है और उनका आशीर्वाद परिवार पर बना रहता है.
पितृ पक्ष के सोलह दिनों में लोग अपने पूर्वजों की तिथि के अनुसार श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण करते हैं. गरुड़ पुराण और धर्म शास्त्रों में भी इन कर्मों के लिए समय से जुड़े नियम बताए गए हैं.
दोपहर का समय है खास
सामान्य पूजा- पाठ के लिए ब्रह्म मुहूर्त को शुभ माना जाता है, लेकिन पितरों के श्राद्ध के लिए दोपहर का समय महत्वपूर्ण माना गया है. परंपरागत रूप से कुतुप मुहूर्त, रौहिण मुहूर्त और इसके बाद आने वाले अपराह्न काल में श्राद्ध कर्म करने का विधान बताया गया है. दिन के आठवें मुहूर्त को कुतुप काल कहा जाता है. इसकी अवधि सूर्योदय और स्थान के अनुसार बदल सकती है. सामान्य गणना में यह दोपहर 12 बजे से करीब 24 मिनट पहले शुरू होकर 24 मिनट बाद तक रहता है. इस तरह इसकी अवधि लगभग 48 मिनट मानी जाती है.
खास माना गया कुतुप काल
धार्मिक मान्यता है कि कुतुप काल के दौरान पितर अपने वंशजों के आसपास मौजूद रहते हैं और उनके द्वारा अर्पित अन्न और जल को स्वीकार करते हैं. इसी कारण इस समय किए गए श्राद्ध को विशेष महत्व दिया जाता है. पितृ पक्ष में होने वाले श्राद्ध को परवण श्राद्ध की श्रेणी में रखा गया है. धार्मिक विधि के अनुसार, पहले श्राद्ध कर्म पूरा किया जाता है और उसके बाद तर्पण किया जाता है इसलिए पूर्वजों के निमित्त कर्म करते समय सही तिथि के साथ कुतुप काल और अपराह्न के समय का ध्यान रखना महत्वपूर्ण माना गया है.
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