नई दिल्ली | लाल किले के लाहौरी गेट पर आने वाले लोगों को अब इसका एक हिस्सा पहले जैसा गहरे लाल रंग में दिखाई नहीं देगा. गेट के वेल एरिया का रंग हल्का कत्थई नजर आने लगा है. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) ने अध्ययन के बाद यहां वर्षों से मौजूद लाल पेंट की परतें हटा दी हैं. एएसआइ के मुताबिक इस हिस्से को उस मूल स्वरूप के करीब लाया गया है, जैसा यह 1648 में निर्माण के समय था.
लाहौरी गेट की दीवारों पर समय के साथ लाल रंग की कई परतें चढ़ गई थीं. इससे नमी दीवारों के अंदर पहुंच रही थी और मूल मुगलकालीन अनगढ़े पत्थरों की चिनाई व मेहराबों की बनावट भी ढक गई थी.
ब्लास्टिंग तकनीक का इस्तेमाल
पुराने पेंट को हटाने के लिए एएसआइ ने सैंड ब्लास्टिंग तकनीक का इस्तेमाल किया. इसमें कंप्रेस्ड हवा के दबाव से बालू के कण सतह पर छोड़े जाते हैं. पेंट हटाने के बाद ढीले पत्थरों को मजबूत किया गया. दरारों की मरम्मत और प्वाइंटिंग के लिए चूने के गारे का इस्तेमाल हुआ. 1857 में लाल किले पर कब्जे के बाद अंग्रेजों ने लाहौरी गेट और दिल्ली गेट के आसपास कई बदलाव किए थे. गेटों के ऊपर भारी तोपें पहुंचाने के लिए सीढ़ियां और अतिरिक्त निर्माण किया गया था. यही निर्माण अब धरोहर का हिस्सा है. प्रधानमंत्री इन्हीं सीढ़ियों से प्राचीर तक पहुंचते हैं.
रंग में होगा बदलाव
लाहौरी गेट के प्रवेश क्षेत्र की छत और खंभों की दरारों को भी ठीक किया गया है. खंभों पर जमा पेंट हटाया गया, जबकि ब्रिटिश काल की ईंटों और सीमेंट वाले हिस्सों में अर्ध-मोल्डेड चूने के प्लास्टर और पारंपरिक चूने की सामग्री से प्वाइंटिंग की गई है. एएसआइ दिल्ली गेट का भी अध्ययन करा चुका है और आने वाले समय में वहां भी रंग में बदलाव किया जाएगा. इससे पहले मीना बाजार के कुछ हिस्सों में भी सैंड ब्लास्टिंग तकनीक से संरक्षण कार्य किया गया था.
