भिवानी | सर्दियों के मौसम में हरियाणा के तालाब और जलभराव वाले इलाके विदेशी पक्षियों के लिए ठिकाना बन जाते हैं। हर साल हजारों किलोमीटर का सफर तय कर आने वाले इन खूबसूरत मेहमानों को इस बार मौसम की मार झेलनी पड़ रही है। कम बारिश और बढ़ते तापमान ने इनके रहने और भोजन तलाशने की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। बता दें कि तंजानिया नहीं, बल्कि मध्य एशिया और यूरोप के ठंडे इलाकों से आने वाले ग्रेटर फ्लेमिंगो (राजहंस) हरियाणा के कई वेटलैंड में पहुंचने लगे हैं।

भिवानी, चरखी दादरी के बिरही कलां, झज्जर के भिंडावास वन्यजीव अभयारण्य और गुरुग्राम के चंदू वेटलैंड में इनकी मौजूदगी देखी गई है। हालांकि, इस बार इनकी संख्या पहले के मुकाबले कम बताई जा रही है।
पक्षियों का सहारा
विशेषज्ञों के मुताबिक, अक्टूबर में भी सामान्य से ज्यादा तापमान और कम बारिश के कारण कई जलाशयों का पानी तेजी से घटा है। इससे नीले-हरे शैवाल, जलीय कीड़े और छोटे जलीय जीवों की उपलब्धता प्रभावित हो रही है। ऐसे में पक्षियों को भोजन और सुरक्षित ठिकाने की तलाश में दूसरी जगहों पर जाना पड़ सकता है। नजफगढ़ वेटलैंड में पानी की कमी, अतिक्रमण और अवैध शिकार जैसी चुनौतियों के बीच हरियाणा के ग्रामीण जलक्षेत्र इन पक्षियों के लिए अहम बन रहे हैं।
बिरही कलां, भिंडावास और चंदू जैसे इलाकों में इनके ठहरने की उम्मीद है। वन्यजीव विभाग के अनुसार, ये पक्षी अगले तीन से चार महीने तक यहां रह सकते हैं। तापमान बढ़ने पर इनके गुजरात के कच्छ या दूसरे क्षेत्रों की ओर लौटने की संभावना है।
वेटलैंड बचाने की जरूरत
पक्षी विशेषज्ञ एवं अशोका यूनिवर्सिटी, सोनीपत के रिसर्चर राकेश अहलावत के अनुसार, डीघल और गुरुग्राम के चंदू वेटलैंड के आसपास कई जलक्षेत्र कम बारिश और गर्मी के कारण सूख गए हैं। उन्होंने बिरही कलां और डीघल जैसे इलाकों को संरक्षित करने पर जोर दिया है। वेटलैंड को प्रदूषण, शहरीकरण और मानवीय दखल से बचाना जरूरी है। इन जलक्षेत्रों का संरक्षण नहीं हुआ तो प्रवासी पक्षियों के लिए हरियाणा में सुरक्षित ठिकाने लगातार कम हो सकते हैं।