रोहतक | त्योहारों पर पूजा-पाठ से लेकर शादी-ब्याह तक बताशे की मांग बनी रहती है। बाजार में मिलने वाली इस मिठास के पीछे कई परिवारों की सालों पुरानी मेहनत और परंपरा जुड़ी है। रोहतक में एक ऐसा ही परिवार है, जिसकी तीसरी पीढ़ी आज भी पारंपरिक तरीके से बताशे बनाने का काम कर रही है। बता दें कि शहर के सालारा मोहल्ले में परिवार के दो गोदामों में बताशे तैयार किए जाते हैं।

यहां बनने वाले बताशों की सप्लाई रोहतक के अलावा हरियाणा के कई बाजारों में होती है। त्योहारों के दिनों में मांग बढ़ने पर रोजाना आठ से नौ क्विंटल तक बताशे बनाए जाते हैं। शोरा कोठी निवासी दिवेश ने बताया कि उनके दादा दिलबाग ने सीमित संसाधनों के बीच मेहनत से इस कारोबार की शुरुआत की थी।
पिता ने बढ़ाया आगे
उनके पिता नरेंद्र ने भी इस काम को संभाला और पारिवारिक परंपरा को आगे बढ़ाया। अब दिवेश खुद इसकी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। दिवेश के मुताबिक, उनके पिता नरेंद्र ने वर्ष 1994 में पुरानी सब्जी मंडी में दुकान शुरू की थी। तब से यहां से रोजाना बताशों की सप्लाई की जा रही है। परिवार के दादा के भाई और एक चाचा भी इसी काम से जुड़े हुए हैं।
त्योहारों में बढ़ जाता है उत्पादन
दिवेश ने बताया कि सामान्य दिनों में रोजाना दो से तीन क्विंटल बताशे तैयार किए जाते हैं, जबकि त्योहारी सीजन में उत्पादन बढ़ाकर आठ से नौ क्विंटल तक पहुंच जाता है। बताशों के अलावा यहां मीठे खिलौने, करवे और मीठी मठरी भी बनाई जाती हैं। छोटे और बड़े आकार के बताशे भी ग्राहकों की मांग के अनुसार तैयार होते हैं। बताशे बनाने की प्रक्रिया में चीनी और पानी का सही अनुपात रखना बेहद जरूरी होता है।
मिश्रण को उचित तापमान तक पकाने के बाद उसे आकार दिया जाता है। इस पूरे काम में अनुभव और सावधानी की जरूरत होती है, तभी बताशे सही आकार और बनावट में तैयार हो पाते हैं।