हिसार | धान की कटाई के बाद खेतों में बचने वाली पराली का प्रबंधन किसानों के लिए बड़ी चुनौती रहता है. प्राकृतिक तरीके से फसल अवशेषों को गलने में समय लगता है, जबकि किसानों को अगली फसल की बुवाई के लिए खेत जल्दी तैयार करना होता है. इसी समस्या के समाधान के लिए चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (HAU) ने जैविक विकल्प के तौर पर बायो डी-कंपोजर के इस्तेमाल की जानकारी किसानों को दी है.
विश्वविद्यालय के मुताबिक HAU Bio Decomposer फसल अवशेषों को खेत में ही जैविक तरीके से विघटित करने में मदद कर सकता है. इसे कृषि मेले में पहली बार किसानों के लिए रखा गया, जहां इसकी खरीद को लेकर किसानों में रुचि देखने को मिली.
अपघटन में मिलेगी मदद
धान की कटाई के बाद पराली को प्राकृतिक रूप से गलने में समय लगता है. इससे अगली फसल के लिए खेत तैयार करने में देरी हो सकती है. कई किसान समय बचाने के लिए पराली जलाने का रास्ता अपनाते हैं, जिससे वायु प्रदूषण बढ़ने के साथ मिट्टी की गुणवत्ता पर भी असर पड़ता है. श्वविद्यालय ने किसानों को बताया कि बायो डी-कंपोजर में लाभकारी सूक्ष्म जीव मौजूद होते हैं. ये सूक्ष्म जीव फसल के बचे हुए अवशेषों के जैविक अपघटन की प्रक्रिया में मदद करते हैं. इससे पराली को जलाने के बजाय खेत में ही मिट्टी के साथ मिलाया जा सकता है.
मिलेंगे पोषक तत्व
पराली को खेत में ही विघटित करने का एक फायदा पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण के रूप में भी मिल सकता है. फसल अवशेषों के मिट्टी में मिलने से कार्बनिक पदार्थ बढ़ाने और मिट्टी की जैविक गुणवत्ता में सुधार करने में मदद मिल सकती है. पराली जलाने पर खेत में मौजूद जैविक पदार्थ और कई उपयोगी पोषक तत्व प्रभावित हो सकते हैं. ऐसे में बायो डी-कंपोजर को पराली प्रबंधन के जैविक विकल्प के रूप में किसानों के सामने रखा गया है.
किसानों ने दिखाई रुचि
HAU ने कृषि मेले के दौरान किसानों को बायो डी-कंपोजर के इस्तेमाल और इससे होने वाले संभावित फायदों की जानकारी दी. पहली बार मेले में उपलब्ध कराए गए इस उत्पाद को लेकर किसानों की अच्छी प्रतिक्रिया रही और इसकी खरीद भी की गई.
