अंबाला | हरियाणा के अंबाला जिले में स्थित बराड़ा में विशाल रावण बनाने की कहानी किसी रिकॉर्ड की चाहत से शुरू नहीं हुई थी. इसके पीछे तेजेंद्र चौहान की जिंदगी से जुड़ा एक दिलचस्प मोड़ था. पिता अमी सिंह चौहान की नाराजगी के बाद खुद को बदलने की कोशिश कर रहे तेजेंद्र को सामाजिक और सांस्कृतिक काम से जुड़ने की सलाह मिली. बराड़ा में बंद हो चुकी रामलीला को दोबारा शुरू करने की जिम्मेदारी भी उन्हें दी गई. यहीं से उस सफर की नींव पड़ी, जिसने आगे चलकर बराड़ा के दशहरे को अलग पहचान दिलाई. आगे कैसा रहा सफर जानने के लिए आर्टिकल के अंत तक बने रहिए…
तेजेंद्र चौहान के पिता अमी सिंह चौहान हेडमास्टर थे. युवावस्था में पढ़ाई छोड़ने और झगड़ों में पड़ने के कारण तेजेंद्र के व्यवहार से उनके पिता नाराज रहते थे. बाद में तेजेंद्र ने अपनी जिंदगी बदलने और पिता को खुश करने के लिए उनसे कोई जिम्मेदारी देने को कहा.
Limca Book of Records में जगह
पिता ने बराड़ा में बंद हो चुकी रामलीला को फिर शुरू करने की जिम्मेदारी सौंप दी. रामलीला शुरू करना आसान नहीं था. तेजेंद्र चौहान के मुताबिक, उनके पुराने व्यवहार के कारण शुरुआत में गांव के लोग सहयोग करने को तैयार नहीं थे. दोस्तों की मदद से रामलीला का आयोजन हुआ, लेकिन दशहरे के लिए रावण का पुतला तैयार करना अगली चुनौती थी. कृषि विभाग से जुड़े एक कर्मचारी की मदद लेकर चौहान ने 1986 में करीब 20 फीट ऊंचा अपना पहला रावण बनाया. इसके अगले साल 1987 में श्री रामलीला क्लब का गठन हुआ.
रावण के पुतले तैयार करने का सिलसिला नियमित हो गया और उसकी ऊंचाई धीरे-धीरे बढ़ाई जाने लगी. विशाल पुतलों के कारण बराड़ा का दशहरा दूर-दराज के लोगों के बीच भी चर्चित होने लगा. क्लब के रावण के पुतलों को ऊंचाई के लिए पांच बार Limca Book of Records में जगह मिली.
आई ये चुनौतियां
बराड़ा में रावण की ऊंचाई आखिरकार 210 फीट तक पहुंच गई. 2017 में भी यहां 210 फीट का पुतला तैयार किया गया था. इसे बनाने में करीब 60 कारीगरों ने छह महीने तक काम किया और इसकी लागत 25 लाख रुपये से अधिक बताई गई थी, लेकिन पुतला जितना बड़ा होता गया, आयोजन के लिए जगह उतनी ही बड़ी समस्या बनती गई. जिस मैदान में शुरुआती दौर में आयोजन होता था, उसका क्षेत्र करीब 24 एकड़ था. आसपास कॉलोनियां बनने के बाद 2018 तक उपलब्ध जगह घटकर करीब 6 एकड़ रह गई. क्लब को आयोजन के लिए लगभग 20 एकड़ जमीन की जरूरत थी.
पंचकूला और फिर चंडीगढ़
जगह की समस्या के कारण 2018 में विशाल रावण और दशहरा आयोजन को बराड़ा से पंचकूला के सेक्टर-5 स्थित शालीमार ग्राउंड ले जाया गया. यहां तेजेंद्र चौहान की टीम ने 210 फीट ऊंचा रावण तैयार किया. इसके 1 साल बाद 2019 में यह सफर चंडीगढ़ पहुंचा. धनास में 221 फीट ऊंचा रावण तैयार किया गया, जो बराड़ा में बनाए गए 210 फीट के पुतले से 11 फीट ऊंचा था. इस तरह बराड़ा में महज 20 फीट के पुतले से शुरू हुआ सफर समय के साथ 221 फीट की ऊंचाई तक पहुंच गया.
