आखिर कहाँ थे बापू ,जब पूरा देश मना रहा था जश्न-ए आजादी

15 अगस्त 1947 को भारत ब्रिटिश सत्ता से आजाद होकर एक पूर्णतः संप्रभु देश बन गया था जहां वह अपने सभी फैसले लोकतांत्रिक नियमों के तहत स्वयं लेने में सक्षम था. इस आजादी दिवस के जश्न को मनाने का अवसर पाने में जिसने सबसे अधिक संघर्ष किया वो महान शख्शियत राष्ट्रपिता बापू ही थे. पर वो 15 अगस्त के दिन जब लाल किले पर आजादी समारोह का आयोजन हो रहा था तब वहां नहीं थे. ऐसे खास मौके पर उनकी अनुपस्थिति सभी को खल रही थी.

Mahatma Gandhi

कहाँ थे इस खास मौके पर बापू?

जब पूरा देश आजादी का जश्न मना रहा था तब राष्ट्रपिता बापू बंगाल के नोआखाली में हिंदुओं व मुसलमानों के बीच हो रही साम्प्रदायिक हिंसा को शांत करने हेतु सौहार्द की कामना कर रहे थे. उन्होंने गांव- गांव घूमकर आपसी भाईचारे का संदेश देते हुए उन्हें बिना भेदभाव के प्रेम से रहने की प्रार्थना की. जब उनकी बात किसी ने नहीं मानी तो उन्होंने गांव के हिंदू- मुस्लिम सभी बच्चों को एकसाथ खेलने के लिए बुलाया तो वे बिना झिझक एक दूसरे से बिना डरे खेलने को राजी हो गए. जिससे दोनों समुदायों को सन्देश मिला व उन्होंने सामूहिक शांति की शपथ लेते हुए एक दूसरे को न मारने का प्रण लिया.

इस प्रकार बापू वहां शांति कायम करने में सफल रहे. जिससे उनका आजादी का जश्न वास्तविक रूप से चरितार्थ हुआ व पूरे देश को सत्य, अहिंसा व शांति का संदेश मिला. नोआखाली में हुई इस घटना ने फिर से महात्मा गांधी के धैर्य, निर्भयता व उदार चरित्र का परिचय दिया. वहीं सरदार पटेल ने जब अपना दूत उन्हें बुलाने कोलकाता भेजा तो उन्होंने आशीर्वाद के रूप में सूखा पत्ता देकर उसे स्वतंत्रता का जश्न धूमधाम से मनाने का आग्रह किया तथा स्वयं का वहीं रहना अपना परम् कर्तव्य बताया.

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