चंडीगढ़ | किसानों और जमीन मालिकों के लिए अपनी जमीन विकास परियोजनाओं में देना अब सिर्फ मुआवजे तक सीमित नहीं रहेगा। हरियाणा सरकार ने ऐसी व्यवस्था की है, जिसमें जमीन देने वाले भू-मालिकों को विकसित प्लॉट में भी हिस्सेदारी मिलेगी। इसके साथ ही उन्हें कुछ वर्षों तक आर्थिक सहायता भी दी जाएगी। बता दें कि मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में लैंड पूलिंग पॉलिसी-2026 को मंजूरी दी गई है।

यह नई नीति पुरानी लैंड पूलिंग पॉलिसी-2022 की जगह लेगी। इसके तहत जमीन देने वाले भू-मालिकों को परियोजना के कुल बिक्री योग्य क्षेत्र का 50 प्रतिशत हिस्सा मिलेगा। साथ ही, 4 साल तक प्रति एकड़ हर साल एक लाख रुपये की अंतरिम वित्तीय सहायता दी जाएगी।
50 प्रतिशत विकसित क्षेत्र
नई नीति के अनुसार, स्वीकृत लेआउट प्लान में शामिल कुल बिक्री योग्य क्षेत्र का आधा हिस्सा जमीन देने वाले भू-मालिकों को आवंटित होगा। बाकी 50 प्रतिशत हिस्सा विकास एजेंसी के पास रहेगा। भू-मालिकों को उनके जमीन के योगदान के अनुपात में विकसित प्लॉट मिलेंगे। पात्रता के अनुसार उनके हिस्से में वाणिज्यिक स्थल भी शामिल हो सकते हैं। पुराने नियम में 50 प्रतिशत हिस्से को बाजार मूल्य से जोड़ने का प्रावधान था, जिसे अब हटा दिया गया है।
हर एकड़ पर मिलेंगे 1 लाख रुपये
जमीन देने वाले किसानों को सेल डीड के पंजीकरण की तारीख से लगातार चार साल तक प्रति एकड़ सालाना एक लाख रुपये मिलेंगे। इस तरह एक एकड़ जमीन देने पर कुल चार लाख रुपये की सहायता मिल सकती है। यदि सेल डीड के 15 दिनों के भीतर भुगतान नहीं होता है तो देरी की अवधि के लिए 9 प्रतिशत सालाना साधारण ब्याज भी देना होगा।
अब मिलेंगे 4 साल
सरकार ने विकास परियोजनाओं की समय-सीमा पांच साल से घटाकर चार साल कर दी है। विकास एजेंसी को अंतिम मंजूरी मिलने के चार साल के भीतर जरूरी बुनियादी सुविधाएं विकसित करनी होंगी। ऐसा नहीं होने पर भू-मालिकों को उनकी जमीन वापस करने का प्रावधान रखा गया है। नई नीति में विकसित भूखंडों का न्यूनतम आकार भी निर्धारित किया गया है।
- आवासीय प्लॉट: 100 वर्ग मीटर
- औद्योगिक प्लॉट: 250 वर्ग मीटर
- संस्थागत प्लॉट: 500 वर्ग मीटर