महेंद्रगढ़ | हरियाणा में कई ऐसी ऐतिहासिक इमारतें हैं, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। महेंद्रगढ़ जिले के नारनौल में मौजूद एक ऐसा ही ऐतिहासिक स्मारक है, जिसकी बनावट आज भी लोगों को हैरान करती है। इसके एक जैसे दिखने वाले दरवाजे और घुमावदार रास्ते किसी को भी दिशा भुला सकते हैं। बता दें कि इस इमारत को ‘चोर गुंबद’ के नाम से जाना जाता है। जी हां, तो चलिए आज इसके बारे में विस्तार से बात करते हैं…

इसका निर्माण दिल्ली सल्तनत के सुल्तान फिरोज शाह तुगलक के शासनकाल (1351-1388 ईस्वी) के दौरान अफगान रईस और व्यापारी जमाल खान ने अपने मकबरे के रूप में करवाया था। यह इमारत लखनऊ की मशहूर भूल भुलैया से करीब चार सौ साल पुरानी मानी जाती है।
20 दरवाजों वाली अनोखी बनावट
चोर गुंबद की सबसे खास बात इसकी वास्तुकला है। इसकी चारों दीवारों में पांच-पांच मेहराबदार रास्ते हैं, जिससे कुल 20 दरवाजे बनते हैं। इन दरवाजों का आकार और रूप लगभग एक जैसा है। गलियारों में बार-बार आने वाले मोड़ लोगों को भ्रमित कर देते हैं और सही रास्ता पहचानना मुश्किल हो जाता है। लंबे समय तक वीरान रहने के कारण यह इमारत डाकुओं, ठगों और चोरों के छिपने का ठिकाना बन गई थी।
उन्हें पकड़ने आने वाले लोग भी इसके रास्तों में उलझ जाते थे। इसी वजह से स्थानीय स्तर पर इसे चोर गुंबद कहा जाने लगा। इसे व्यंग्य में ‘साहूकार गुंबद’ भी पुकारा जाता था। इतिहासकार प्रोफेसर आर. नाथ ने अपनी पुस्तक हिस्ट्री ऑफ मुगल आर्किटेक्चर में इसे तुगलक काल और शुरुआती क्षेत्रीय अफगान स्थापत्य का महत्वपूर्ण उदाहरण बताया है। स्थानीय कारीगरों ने इसे अरावली क्षेत्र के भूरे-धूसर पत्थरों से बनाया था। इसकी बाहरी दीवारें नीचे से चौड़ी और ऊपर की ओर अंदर झुकी हुई हैं।
कभी दूर से दिखाई देती थी इमारत
ऊंची पहाड़ी पर बनी चोर गुंबद दूर से ही दिखाई देती थी। इतिहासकारों के अनुसार, उस दौर में भव्य इमारतें रसूख और प्रतिष्ठा का प्रतीक मानी जाती थीं। इसी कारण यह स्मारक पुराने समय में नारनौल की पहचान के रूप में भी देखा जाता था।