चंडीगढ़ | आज हरियाणा की पहचान खेल, खेती, उद्योग और समृद्धि के लिए होती है, लेकिन 1 नवंबर 1966 से पहले इसकी अपनी अलग राज्य की पहचान नहीं थी। कभी रेतीली जमीन और कीकर के जंगलों के लिए पहचाने जाने वाले इस इलाके ने अलग प्रदेश बनने के लिए लंबा संघर्ष किया। इस राज्य की कहानी सिर्फ राजनीतिक आंदोलन नहीं, बल्कि अपनी भाषा और पहचान की लड़ाई भी है।

1 नवंबर 1966 को पंजाब से अलग होकर हरियाणा देश का 17वां राज्य बना। हालांकि, इस क्षेत्र का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व बहुत पुराना है। महाभारत की धरती कुरुक्षेत्र इसी प्रदेश में है, जहां भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। हरियाणा नाम को ‘हरि’ और ‘आना’ शब्दों से जोड़कर भी देखा जाता है।
अलग हरियाणा की मांग
अलग हरियाणा बनाने की मांग आजादी से पहले शुरू हो चुकी थी। इस आंदोलन में कई नेताओं ने भूमिका निभाई, जिनमें चौधरी देवी लाल और प्रोफेसर शेर सिंह प्रमुख थे। वहीं, कुछ स्थानीय नेता अलग राज्य के पक्ष में नहीं थे। इनमें राव बीरेंद्र सिंह और भगवत दयाल शर्मा के नाम भी शामिल थे, जो आगे चलकर हरियाणा के मुख्यमंत्री बने। आजादी के बाद अलग-अलग भाषाओं के आधार पर नए राज्य बनाने की मांग तेज हुई। इस मुद्दे पर जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल और पट्टाभि सीतारमैया की जेवीपी कमेटी बनाई गई। कमेटी ने भाषाई आधार पर राज्यों के गठन का समर्थन नहीं किया और राष्ट्रीय एकता को प्राथमिकता देने की बात कही।
आदरणीय प्रधानमंत्री श्री @narendramodi जी, 61वें हरियाणा दिवस के पावन अवसर पर आपके द्वारा भेजे गए आत्मीय पत्र के लिए हृदय से आभार ।🙏
शुरुआत से ही कर्मवीरों की भूमि हरियाणा के प्रति आपका हार्दिक लगाव रहा है। इसी का परिणाम है कि आपके दूरदर्शी नेतृत्व और केंद्र सरकार के सहयोग से हमारे राज्य ने शिक्षा, खेलकूद, बुनियादी ढाँचे, किसान कल्याण, महिला सशक्तिकरण और स्टार्टअप जैसे क्षेत्रों में अभूतपूर्व प्रगति की है।
मैं प्रदेश के 2.80 करोड़ परिवारजनों की ओर से विश्वास दिलाता हूँ कि हम आपके स्नेह और संरक्षण की छाया में विकसित भारत @ 2047 के राष्ट्रीय संकल्प की सिद्धि के लिए पूरी प्रतिबद्धता से कार्य करते रहेंगे।
जय हरियाणा! जय हिंद!
— Nayab Saini (@NayabSainiBJP) November 1, 2026
हालांकि, 1952 में पोट्टि श्रीरामुलु की अनशन के दौरान मौत के बाद आंध्र राज्य की मांग ने जोर पकड़ लिया। आंदोलन तेज होने पर सरकार को अलग आंध्र राज्य बनाने का फैसला लेना पड़ा।
आयोग ने नहीं दी थी मंजूरी
इसके बाद 19 दिसंबर 1953 को राज्य पुनर्गठन आयोग बनाया गया, जिसे फजल अली आयोग भी कहा जाता है। आयोग ने विभिन्न क्षेत्रों का दौरा कर लोगों की राय जानी और 1956 में रिपोर्ट सौंपी। इसमें अलग हरियाणा की मांग को स्वीकार नहीं किया गया। रिपोर्ट में विकास के लिए जरूरी संसाधनों की कमी को इसकी एक वजह बताया गया। आंदोलन को शांत करने के लिए संयुक्त पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री भीमसेन सच्चर ने सच्चर फॉर्मूला पेश किया। इसमें हिसार, करनाल, रोहतक, नारायणगढ़, अंबाला और कांगड़ा को हिंदी भाषी क्षेत्र तथा बाकी हिस्से को पंजाबी भाषी क्षेत्र माना गया। हालांकि, दोनों क्षेत्रों के लोगों ने इस व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया। अलग हरियाणा की मांग इसके बाद भी जारी रही।