चंडीगढ़ | हरियाणा एवं पंजाब सीमा पर स्थित गुहला- चीका क्षेत्र में बना शौरी मंदिर डेरा आज भी गहरी आस्था और ऐतिहासिक परंपराओं का प्रतीक माना जाता है. यहां के लोगों का कहना है कि यह डेरा न केवल आस्था का केंद्र है बल्कि कठिन समय में आशा और विश्वास का आधार भी है.
स्थापना एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
कहा जाता है जब चीका का नगर अस्तित्व में आया था, तब आसपास के जंगल में एक साधु प्रयाग पुरी तपस्या में ली थे. उन्होंने वही डेरा स्थापित किया और बाद में अपने शिष्य शौरी पुरी को इसकी देखरेख सौंपकर स्वयं समाधि ले ली तब से यह स्थल श्रद्धालुओं के लिए धार्मिक महत्व का प्रतीक बन गया.
वर्तमान में डेरा के सेवादार नागा साधु महंत रामपुरी का कहना है कि शौरी पुरी के बाद कई महंतों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया और कठिन साधना के बल पर लोगों की भक्ति और आस्था को मजबूत किया.
प्राकृतिक आपदाओं से जुड़ी मान्यता
स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार कई दशक पहले गुहला- चीका क्षेत्र लगातार दो वर्षों तक प्राकृतिक आपदाओं की चपेट में रहा. कभी भीषण ओलावृष्टि हुई तो कभी टिड्डी दल ने खेतों को चट कर दिया. तब किसानों ने महंत पत्तासा पुरी से सहायता की प्रार्थना की.तब महंत ने विशेष ध्यान साधना और धार्मिक अनुष्ठान किए. इसके बाद में आपदाओं का प्रकोप शांत हो गया. लोगों का विश्वास है कि संतों की तपस्या और आशीर्वाद से क्षेत्र को बड़ी विपत्तियों से राहत मिली. हालांकि, यह आस्था का विषय है लेकिन आज भी ग्रामीण इस परंपरा को श्रद्धा के साथ याद करते है. लोगों का विश्वास है कि यहां मन्नतें भी पूरी होती है.
