हिसार | आधुनिक इमारतों के दौर में भी हिसार का गांव डाबड़ा की ऐतिहासिक हवेलियां आज अपनी भव्यता और मजबूत निर्माण शैली से लोगों को आकर्षित कर रही हैं. करीब 146 और 193 वर्ष पुरानी ये हवेलियां न सिर्फ पुराने दौर की वास्तुकला का बेहतरीन उदाहरण हैं, बल्कि हरियाणा के सांस्कृतिक इतिहास की भी अनमोल धरोहर मानी जाती हैं. ऊंचे लकड़ी के दरवाजे, पीतल से सजी चौखटें, लाखोरी ईंटों की मोटी दीवारें और विशाल आंगन आज भी उस समय की समृद्ध शिल्पकला की कहानी बयां करते हैं. इन हवेलियों ने अंग्रेजी शासन से लेकर आजादी, हरियाणा के गठन और बदलते दौर तक का इतिहास देखा है.

समय के साथ गांवों की तस्वीर बदल गई लेकिन इनकी मजबूती और खूबसूरती आज भी बरकरार है. इन्हें देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस समय के कारीगर केवल निर्माण कार्य के साथ- साथ ईंट और पत्थर में कला भी उकेरते थे.
डाबड़ा का इतिहास
परिवार की पांचवीं पीढ़ी से जुड़े बलजीत सिंह डाबड़ा बताते हैं कि उनके पूर्वज धन्ना सिंह वर्ष 1833 में राजस्थान के सीकर जिले से डाबड़ा आए थे. यहीं उन्होंने परिवार बसाया और पहली हवेली का निर्माण कराया. इसके बाद वर्ष 1880 में सरदार ईशर सिंह ने दूसरी भव्य हवेली बनवाई. उस समय गांव तक निर्माण सामग्री पहुंचाना आसान नहीं था. मजबूत गार्डर नहर मार्ग से लाए गए जबकि सातरोड से ऊंटगाड़ियों और रेहड़ियों के जरिए ईंटें गांव तक पहुंचाई गईं. महीनों की मेहनत और पारंपरिक तकनीक से इन हवेलियों का निर्माण पूरा हुआ.
लकड़ी का उपयोग
इन हवेलियों के निर्माण में लाखोरी ईंट, चूना, सुर्खी और साल की मजबूत लकड़ी का उपयोग किया गया. मुख्य द्वारों पर पीतल की नक्काशी, कलात्मक चौखटें, पारंपरिक चित्रकारी और विशाल आंगन आज भी सुरक्षित हैं. यही वजह है कि लगभग दो सदियां बीतने के बाद भी ये हवेलियां मजबूती से खड़ी हैं और लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं.
बलजीत सिंह डाबड़ा के अनुसार परिवार की वंश परंपरा में धन्ना सिंह के बाद ईशर सिंह, हरजीराम, नौनीहाल सिंह, हरि सिंह, पूर्ण सिंह डाबड़ा, बलजीत सिंह, दलजीत सिंह और परमजीत सिंह सहित परिवार के सदस्य इस धरोहर की देखभाल कर रहे हैं. इसी परिवार से हरियाणा सरकार में मंत्री और विधायक भी रह चुके हैं.
ऐतिहासिक धरोहर घोषित
ग्रामीणों की मांग है कि इन ऐतिहासिक हवेलियों को धरोहर घोषित कर संरक्षित किया जाए. यदि इन्हें विरासत पर्यटन से जोड़ा जाए तो डाबड़ा गांव के साथ- साथ पूरे हरियाणा की पारंपरिक वास्तुकला और सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान मिलेगी. साथ ही, आने वाली पीढ़ियां भी अपने गौरवशाली इतिहास और पारंपरिक निर्माण कला से रूबरू हो सकेंगी.