पानीपत: दुनिया भर में जूट के धागे से बने कारपेट की बढ़ी मांग, हर महीने दो हजार टन की खपत

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पानीपत | कोरोना संक्रमण के बावजूद पानीपत से टेक्सटाइल निर्यात करीब 30 फीसद बढ़ गया है. इसकी 2 वजह हैं. पहली वजह तो यह कि चीन से उत्पाद लेने से विदेशी खरीदार कतराने लगे, दूसरी वजह यह रही कि दुनिया के लोग प्राकृतिक धागे से बने कारपेट की मांग ज्यादा करने लगे. इससे जूट के धागे से बने दरियों के ऑर्डर बट गए, दरियां हाथ से बनती हैं इसलिए बुनने वालों की भी आय बढ़ी है.

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2 साल पहले तक पानीपत में जूट का धागा प्रतिभा 100 से 200 टन लगता था, लेकिन कोरोना संक्रमण के वक्त केवल धागे-धागे की मांग हर महीने 500 टन तक पहुँच गई है. कि अब बंगाल से धागा चोटी डोरी नहीं, अब पटसन के फसल की कटाई अगले महीने से शुरू होगी. दरी कालीन उत्पादक जो निर्यात भी है. इसी का इंतजार कर रहे हैं इस वर्ष ओवरॉल मांग बढ़कर 2500 टन तक पहुँच सकती है. वैसे पानीपत से मांग बढ़ी तो बंगाल के कई हिस्सों में खुशहाली आ सकती है.

जूट के दरिया बैग टेबल मैट का अगर कारोबार बढ़ा तो उसके पीछे की कहानी कृष्ण झूठ सेल्स फैक्टरी चलाने वाले अनिल बंसल से जुड़ी है. कुछ साल पहले तक बंसल जूट की रस्सी से पैकिंग मैटीरियल बनाते उसी से पैकिंग भी करते है. निर्यातकों ने पोलिस्टर पैकिंग की तरफ रुख कर लिया, तो इनका काम बंद होने लगा. जूट के काम में महारत हासिल थी. सो उन्होंने सोचा कि क्यों नए निर्यात को जूट के दरिया बनाने के लिए प्रेरित किया जाए. पहले तो बंगाल गए वहां से जूट की डोरी के आकार जैसी डोर बनवाई. अलग-अलग किस्म के धागे लेकर आए, इतना ही नहीं पानीपत के निर्यातकों को सैंपल भी बनाकर दिखाए. उनका यह प्रयोग काम कर गया. एक हज़ार करोड़ से ज्यादा का सालाना कारोबार करने वाले देवी गिरी, एक्सपोर्ट से लेकर छोटे एक्सपोर्टर के पास प्राकृतिक धागे से बने उत्पाद के ऑर्डर आने लगे.

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प्राकृतिक धागे से बने उत्पादों की मांग में पिछले साल उछाल आया. दुनिया कोरोना से जूझ रही थी, अमेरिका इंग्लैंड जर्मनी से लेकर बड़े देशों में लॉकडाउन था. चिकित्सा विशेषज्ञ बता रहे थे, कि पोलिस्टर धागे से बने उत्पादों के बजाय प्राकृतिक धागे से बने उत्पादों का उपयोग किया जाए. सो लोगों का रुझान प्राकृतिक धागे से बने उत्पादों में रुचि इस कारण भी बढ़ी, क्योंकि अब जूट के धागे रंगे जाने लगे थे. उनसे बने उत्पाद आकर्षक हो चूके थे. नैना विराम हो चूके थे पहले केवल भूरे रंग के होते थे बोरियो के रंग जैसे.

बंगाल में लोगों की आय बढ़ी

अनिल बंसल ने बताया कि बंगाल में लोगों की आय बढ़ गई है. उत्तर 24 परगना में उन्होंने प्रशासन और इसके उत्पाद लेने शुरू किए थे. पहले वे साइकिल पर चलता था आज उसकी बड़ी कोठी है कार हैं वहीं ठाकुरनगर एरिया के घर घर में चोटी वाली दूरी बनाने लगी है. एक परिवार रोजाना एक हज़ार तक कमा रहा है.

कारोबार अभी और बढ़ेगा

निर्यातक विनय शर्मा का कहना है, कि इस समय जूट के धागे दौरे की बहुत कमी है. विदेशी खरीदार रोजाना आ ऑर्डर दे रहे हैं. लेकिन उनके पास कच्चा माल ही नहीं है. इस वजह से ऑर्डर नहीं ले पा रहे हैं. जिनके पहले से ऑर्डर दिए हुए हैं उन्हें भी पहुंचाना मुश्किल हो गया है, क्योंकि दागे चोटी का रेट बहुत पढ़ गया है. जुलाई अगस्त में उम्मीद है कि धागा मिलने लगेगा.

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बंगाल के पर्सन फसल से जो डोरी बनती, उसमें रेशा आ जाता था निर्यातकों को इससे दिक्कत आने लगी. तब अनिल और अशोक बंसल दोनों भाई बांग्लादेश पहुंचे वहाँ पर ये फसल और ज्यादा बेहतर होती है. डोरी की लंबाई भी ज्यादा निकलती वहाँ कई मिलों से बात कर मशीनरी में बदलाव कराया रेशे की दिक्कत खत्म हो गयी, अब बांग्लादेश से भी डोरी मांगा रहे हैं.

ऐसे समझें तरक्की का गणित

इस समय जूट का धागा 120 से 130 रुपये प्रति किलो मिल रहा है. सामान्य सीज़न में 100 रुपये औसत पड़ जाता है. इस समय दो हजार टन यानी महीने में 20 लाख किलो जूट के दागे हैं. चोटी का इस्तेमाल भी हो रहा है. औसत कीमत कच्चे माल की हुई. बीस करोड़ कारीगरों की आय अन्य खर्च सहित उत्पाद लागत भी 50 करोड़ तक पहुँच जाती है. हर महीने कम से कम 80 से 100 करोड़ का कारोबार तो हो ही रहा है. कारोबार इस साल 30 फीसद तक बढ़ोतरी की उम्मीद लगा रहे हैं.

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अमेरिका में सबसे ज्यादा मांग

निर्यातक रमन छाबड़ा ने बताया कि जूट के उत्पाद की सबसे ज्यादा मांग अमेरिका और फ्रांस में रहती है. पानी की टेक्सटाइल इंडस्ट्री का 60 फीसदी से ज्यादा कारोबार भी अमेरिका से ही होता है. जूट के उत्पाद की मांग इसलिए भी बढ़ी है, क्योंकि अब इसे प्रिंट भी किया जाने लगा है. अलग अलग रंग में उत्पाद बनने से वैरायटीस ज्यादा पसंद आने लगी है. पहले प्लान तक भी पूरे रंग में उत्पाद बनता था पहले एरिया रस्सी बनते थे, पर अब किचन और लॉन्ड्री बास्केट बन रही हैं.

वहीं कोरोना संक्रमण के दौरान दा गेदा गए, कि मांग हर महीने 500 टन तक पहुंच गई है. हालत यह हो गए हैं, कि अब बंगाल में धागा छोटी दूरी आ ही नहीं रहा. पटसन के फसल की कटाई अगले महीने से शुरू हो जाएगी दरी कालीन उत्पादक जो निर्यातक भी है. इसी का इंतजार कर रहे हैं, इस साल ओवरॉल मांग बढ़कर 25 सो टन तक पहुँच सकती है.

बता दे प्राकृतिक धागे से बने उत्पादों की मांग में पिछले साल उछाल आया था. उस दौरान अमेरिका इंग्लैंड जर्मनी से लेकर बड़े बड़े देशों में लॉकडाउन था. चिकित्सा विशेषज्ञ बता रहे थे कि पोलिस्टर धागे से बने उत्पादों के बजाय प्राकृतिक धागे से बने उत्पादों का उपयोग किया जाए. तो लोगों का रुझान प्राकृतिक धागे से बने उत्पादों में रुचि इस कारण भी बढ़ी है, क्योंकि जूट के धागे रंगे जाने लगे थे.

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