नई दिल्ली | केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बताया है कि अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण पर क्रीमीलेयर का सिद्धांत लागू नहीं होता. सरकार ने उन जनहित याचिकाओं का विरोध किया है, जिनमें SC- ST आरक्षण में क्रीमीलेयर लागू करने और आय आधारित व्यवस्था बनाने के लिए नीति तैयार करने की मांग की गई है. SC, ST और SEBC के कल्याण के लिए चल रही अधिकांश सरकारी योजनाओं में पहले से ही ‘साधन परीक्षण’ जैसी व्यवस्था मौजूद है. केंद्र ने याचिकाओं को अस्पष्ट बताते हुए सुप्रीम कोर्ट से उन्हें खारिज करने का अनुरोध किया है. साथ ही, अदालत को आरक्षण नीति या आय आधारित प्राथमिकताओं पर नई नीति बनाने का निर्देश देने से बचना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में केंद्र ने कहा कि संविधान और अब तक के न्यायिक फैसलों में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि क्रीमीलेयर का सिद्धांत SC-ST पर लागू होता है. सरकार के अनुसार, अदालत की पूर्व टिप्पणियां मुख्य रूप से अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़ा वर्ग (SEBC) के संदर्भ में थीं.
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र का हलफनामा
केंद्र ने अशोक कुमार ठाकुर बनाम भारत संघ मामले का हवाला देते हुए कहा कि संविधान पीठ पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि क्रीमीलेयर का सिद्धांत SC-ST आरक्षण पर लागू नहीं होता. सरकार ने यह भी कहा कि क्रीमीलेयर की अवधारणा सबसे पहले 1992 के मंडल आयोग मामले में OBC आरक्षण के संदर्भ में विकसित की गई थी, ताकि आर्थिक और सामाजिक रूप से संपन्न वर्गों को आरक्षण के दायरे से बाहर रखा जा सके.
व्यवस्था का किया विरोध
यदि आरक्षण नीति में आय आधारित प्राथमिकता या किसी अन्य तरह का बदलाव करना हो तो उससे पहले व्यापक सामाजिक- आर्थिक अध्ययन और अनुभवजन्य आंकड़ों की जरूरत होगी. ऐसे नीतिगत फैसले कार्यपालिका और संसद के अधिकार क्षेत्र में आते हैं. केंद्र ने अदालत से कहा कि याचिकाएं किसी मौलिक अधिकार के उल्लंघन को साबित नहीं करतीं, इसलिए वे कानून की दृष्टि से टिकाऊ नहीं हैं. सरकार का कहना है कि मौलिक अधिकार तभी लागू होते हैं, जब राज्य की ओर से उनका उल्लंघन हो.