चंडीगढ़ | पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने क्लर्क पद पर वर्ष 1996 से पदोन्नति और सभी परिणामी लाभ देने की मांग को लेकर करीब छह साल की देरी से दायर याचिका खारिज कर दी. कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता को वर्ष 2006 में ही क्लर्क पद पर पदोन्नति मिल गई थी, लेकिन उसने उस आदेश को चुनौती नहीं दी. इसके बाद 2013 में वर्ष 1996 से पदोन्नति देने की मांग भी खारिज कर दी गई, फिर भी उसने इसके खिलाफ कोई कानूनी कदम नहीं उठाया. जस्टिस सुदीप्ति शर्मा ने हाई कोर्ट कर्मचारी विजय कुमार की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि असाधारण संवैधानिक अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते समय देरी और लापरवाही को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने याचिका में कोई मेरिट नहीं पाते हुए इसे खारिज कर दिया.

विजय कुमार ने मांग की थी कि तीन फरवरी 1996 को टाइपिंग टेस्ट पास करने की तारीख से उसे क्लर्क पद पर वरिष्ठता दी जाए. इसके आधार पर सभी परिणामी लाभ प्रदान किए जाएं. उसने 14 मार्च 2013 के उस आदेश को रद करने की मांग की थी, जिसके जरिए उसका प्रतिनिधित्व खारिज किया गया था.
चपरासी पद पर हुई थी नियुक्ति
याचिका के अनुसार, विजय कुमार की वर्ष 1981 में अवकाश रिक्ति के विरुद्ध तदर्थ आधार पर चपरासी के रूप में नियुक्ति हुई थी. वर्ष 1989 में उसे रेस्टोरर पद पर पदोन्नति मिली. बाद में एक मामले की फाइल गुम होने के संबंध में उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई और 18 अप्रैल 1995 को उसे निलंबित कर दिया गया. विभागीय जांच के दौरान दिसंबर 1995 में हाई कोर्ट ने क्लर्क पद की आगामी रिक्तियों के लिए टाइपिंग टेस्ट में शामिल होने के इच्छुक योग्य सुपरवाइजरों और रेस्टोररों से आवेदन मांगे थे. विजय कुमार ने तीन फरवरी 1996 को टाइपिंग टेस्ट पास किया. हालांकि, उसे स्पष्ट किया गया था कि विभागीय जांच पूरी होने तक उसे पदोन्नति का अधिकार नहीं मिलेगा.
2006 में मिली पदोन्नति
विभागीय जांच में आरोप साबित नहीं हुए और निलंबन अवधि को नियमित कर दिया गया. इसके बाद वर्ष 2006 में पदोन्नति समिति ने विजय कुमार को क्लर्क बनाने की सिफारिश की, जिसे कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश ने मंजूरी दे दी. उसे 18 अगस्त 2006 को पदोन्नति मिली. हाई कोर्ट ने पाया कि पदोन्नति मिलने के बाद भी विजय कुमार ने वर्ष 1996 से पदोन्नति की मांग नहीं उठाई. उसने पहली बार आठ नवंबर 2012 को इस संबंध में प्रतिनिधित्व दिया, जिसे 2013 में खारिज कर दिया गया. इसके बाद भी उसने समय पर कानूनी उपाय नहीं अपनाया.
राहत देने का आधार नहीं
हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि देरी और लापरवाही रिट अदालत के विवेकाधीन अधिकार क्षेत्र में राहत से इनकार करने का आधार हो सकती है. कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता लंबे समय तक निष्क्रिय रहा और उसने पहले के आदेशों को समय पर चुनौती नहीं दी. ऐसे में उसे अब राहत देने का कोई आधार नहीं बनता. कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी.