कर्मचारियों को पक्का करने की आवाज उठाने वाले नायब तहसीलदार को किया ब्लैकमेल, जानिए पूरा मामला

रेवाड़ी | हरियाणा के रेवाड़ी जिले के कार्यवाहक नायब तहसीलदार कपिल लांबा ने 18 जुलाई को संयुक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी के साथ चल रही वीडियो कॉन्फेंसिंग में 20 साल से 20 हजार की नौकरी करने वाले काम कर रहे डाटा एंट्री ऑपरेटर्स व ठेके के कर्मचारियों को पक्का करने की पॉलिसी बनाने की आवाज उठाई थी. अब कपिल लांबा को ब्लैकमेल कर रुपए मांगे जा रहे हैं. सोमवार को सोशल मीडिया पर वीडियो जारी कर कपिल लांबा ने बताया है कि उनके पास एक अंजली नाम की युवती ने वीडियो कॉल की.

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उसके बाद डॉक्यूमेंट बनाने के बहाने उस युवती ने अपने सभी कपड़े उतार दिए. उसके बाद उस युवती ने फोन काट दिया और रुपए मांगे. रुपए नहीं देने पर उस युवती ने वीडियो वायरल करने की धमकी दी और कहा कि आपके खाते में जितने रुपए है सभी मेरे पास भेज दो. हालांकि नायब तहसीलदार कपिल लांबा ने जागरूकता दिखाते हुए इसके स्क्रीनशॉट ले लिए. कपिल लांबा ने इस मामले को लेकर एसपी से शिकायत करने की बात कही है.

डीसी रेट पर लगे हुए कर्मचारियों की उठाई थी आवाज

कपिल लांबा ने संयुक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी के साथ चल रही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में 20 साल से 20 हजार की नौकरी करने वाले काम कर रहे डाटा एंट्री ऑपरेटर्स व ठेके के कर्मचारियों को पक्का करने की पॉलिसी नहीं बनाने को लेकर आवाज उठाई थी. उन्होंने कहा था कि स्टार लगने से कोई अफसर नहीं बन जाता, बल्कि अपने साथ काम करने वाले कर्मचारियों के हकों की लड़ाई लड़ने वाला ही सच्चा अफसर होता है. जब ऑफिस का काम करने वाले कर्मचारियों के हकों की बात आती है तो सभी मुंह फेर कर निकल जाते हैं और जब काम की बात आती है तो 1 घंटे की देरी होते ही हम उनकी और ऊपर वाले हमारी लेनी कर देते हैं.

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कपिल लांबा ने कहा है कि 20 सालों से 50 फीसदी से अधिक काम कर्मचारी ही करते आ रहे हैं. हम तो केवल साइन करते हैं. हालांकि आज भी वह 20 हजार की नौकरी कर रहे हैं. ना कोई इंक्रीमेंट और ना ही किसी सरकारी पॉलिसी का लाभ. बाकी कर्मचारियों की तरह वह भी कर्मचारी है कोई आतंकवादी नहीं. सैक्रटरी साहब 1997, 2000 व 2006 से काम करने वाले जूनियर प्रोग्राम ऑफिसर, डाटा एंट्री ऑपरेटर जैसे कर्मचारी पक्के होते हैं तो ना आपकी जेब से कुछ जाएगा और ना मेरी जेब से. जिस सरकार के लिए काम करते हैं, उसी सरकार को सब कुछ देना है. फिर अपने निलंबन व चार्जशीट के डर से हम उनके हितों में आवाज क्यों नहीं उठा पा रहे हैं.

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