चंडीगढ़ | पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की तरफ से एक मामले में एक बड़ा फैसला दिया गया है. कोर्ट द्वारा अपने निर्णय में साफ किया गया है कि अवैध तरीके से की गई नियुक्ति के आधार पर की गई एडहाक या वर्कचार्ज सेवा को सीनियोरिटी, वेतन निर्धारण या प्रमोशन के लिए नहीं जोड़ा जा सकता. भले ही कर्मचारी को बाद में औद्योगिक न्यायाधिकरण के आदेश से बहाल किया जा चुका है.
हरियाणा में कर्मचारियों के लिए अहम फैसला
कोर्ट का कहना है कि अवैध नियुक्ति से मिली सेवा को नियमित नियुक्ति के समान मानना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 में निहित समानता के सिद्धांत का उल्लंघन समझा जाएगा. जस्टिस दीपिंदर सिंह नलवा की तरफ से हरियाणा स्टेट को- आपरेटिव लैंड डेवलपमेंट बैंक लिमिटेड द्वारा दायर नियमित द्वितीय अपील स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट और निचली अपीलीय अदालत के फैसलों को बदल दिया.
जानें क्या है मामला?
दोनों निचली अदालतों ने पहले यह माना था कि बहाली के आर्डर के बाद कर्मचारियों की पूर्व सेवा को भी सभी लाभों के लिए जोड़ा जाना चाहिए. अगर इस पूरे मामले के बारे में बात करें तो यह मामला बैंक के दो क्लर्क जसवंत सिंह और जगजीत सिंह का है. इन दोनों की सेवाएं वर्ष 1977 में खत्म कर दी गई थीं. बाद में औद्योगिक न्यायाधिकरण ने 12 फरवरी 1990 के अपने आर्डर में दोनों को पूर्ण बकाया वेतन के साथ बहाल करने के लिए निर्देश जारी किए थे.
कोर्ट ने किया स्पष्ट
कर्मचारियों ने इसके आधार पर अपनी पूर्व एडहॉक सेवा को सीनियोरिटी तथा प्रमोशन के लिए जोड़ने की मांग उठाई थी. हाई कोर्ट का कहना है कि सिर्फ बहाली और बैंक वेजेज दिए जाने से यह अपने आप सिद्ध नहीं होता कि कर्मचारी की सेवा की निरंतरता को भी वैधानिक मान्यता मिल चुकी है. अदालत की तरफ से क्लियर किया गया कि न्यायाधिकरण के आदेश में सेवा की निरंतरता देने का कोई स्पष्ट निर्देश नहीं था. ऐसे में ऐसी निरंतरता मान लेना कानून के अनुसार नहीं है.
