करनाल | हरियाणा सरकार (Haryana Govt) की प्रोत्साहन नीति की बदौलत आज सूबे के किसान परम्परागत खेती (सब्जियों की बुआई) का मोह त्याग कर ऑर्गेनिक और बागवानी खेती को बढ़ावा दे रहे हैं. जड़ वाली सब्जियों में मूली, गाजर एवं शलगम आदि सब्जियों को विभिन्न रूप में उपयोग में लाया जाता है. खासतौर पर सर्दियों के मौसम में इन सब्जियों की अत्यधिक मांग होती है. सलाद के रूप में इनका विशेष स्थान होने के चलते ये सब्जियां हर घर की जरूरत बनी हुई हैं. ऐसे में इन सब्जियों की वैज्ञानिक विधि से खेती करके किसान कम लागत में अधिक मुनाफा कमा सकते हैं.
महाराणा प्रताप उद्यान विश्वविद्यालय के सब्जी सलाहकार डॉक्टर सुरेश कुमार ने बताया कि अभी देसी गाजर की बुवाई का उत्तम समय 15 सितंबर से अक्टूबर तक जबकि मूली व शलगम की देसी किस्मों की बुवाई सितंबर के आखिर तक की जा पकती है. वहीं, यूरोपियन किस्म की बुवाई अक्टूबर से नवंबर तक करनी चाहिए. इन किस्मों से बेहतर उत्पादन प्राप्त करने के लिए कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए.
गाजर की उन्नत किस्में करें चयनित
पूसा केसर, हिसार गैरिक देसी गाजर बेहतर हैं. दोनों की पैदावार औसतन 100 से 110 क्विंटल प्रति एकड़ होती है. नैटीस यूरोपियन गाजर की किस्म की जड़े बेलाकार मध्यम लंबी और गहरी संतरी रंग की होती हैं. इसकी औसतन पैदावार लगभग 100 क्विंटल प्रति एकड़ होती है. इसके अलावा, किसान गाजर की KSP 1225, टायकान मारूति व पूसा रूद्रा लगा सकते हैं.
मूली की देशी और शंकर किस्में
पूसा चेतकी, पंजाब सफेद, हिसार श्वेती और जैपनीज व्हाइट हैं. ये चारों किस्में देसी मूली की श्रृंखला में आती हैं, जबकि मूली की व्हाइट आईस्किल यूरोपियन किस्म है, जोकि 35 से 40 दिन में मूली के रूप में तैयार हो जाती हैं. वहीं, मूली की इन किस्मों के अतिरिक्त संकर प्रजातियों को भी किसान उगा सकते हैं. श्वेता, NS 778, आई वरी व्हाइट, प्रियंका स्टार और × X 35 मुख्य किस्में हैं.
शलगम की उन्नत किस्में
इसमें 4 व्हाइट देसी किस्म है, जबकि पर्पल टॉप व्हाइट ग्लोब यूरोपियन किस्में हैं. व्हाइट और पर्पल टॉप व्हाइट ग्लोब दो महत्वपूर्ण जो एक अगेती पैदावार लेने के लिए उपयोगी हैं. इसकी जड़ें ठंड के मौसम में उगाई जाती हैं.
बुवाई की उपयुक्त विधि
सभी जड़ वाली सब्जियों की बुवाई करने से पहले खेत को समतल करें. 2- 3 जुताई करने के पश्चात प्रत्येक जुताई के बाद सुहागा लगाएं, ताकि खेत में उचित नमी बनी रहे और ढले टूट जाएं. गोबर की या केंचुआ खाद का प्रयोग खेत तैयार करने से पहले भूमि के ऊपर डाल दें, ताकि जुताई के समय खाद मिट्टी में अच्छे से मिल जाए.
बिजाई की विधि
प्रति एकड़ गाजर का 4 से 5 किलोग्राम, मूली का 3 किलोग्राम और शलगम का 2 किलोग्राम बीज डालें. डोलियों के बीच का फासला 30 से 45 सेंटीमीटर व पौधों की दूरी 6 से 8 सेंटीमीटर रखें. डोलियों की चोटी पर 2 से 3 सेंटीमीटर नाली बना बीज बोना चाहिए. इसके तुरंत बाद हल्की सिंचाई जरूर करें, ताकि डोली का 1/ 3 भाग नीचे से पानी से भीग जाता है.
