यमुनानगर | कहते हैं कि विपरीत परिस्थितियों का बहाना बनाकर अपनी मंजिल से पीछे हटने वाले कामयाबी से कोसों दूर रह जाते हैं. वहीं, कुछ ऐसे भी होते हैं जो कठिन परिस्थितियों में भी अपने हुनर की पहचान कर सफलता की नई इबारत लिखते हैं. कुछ ऐसी ही कहानी यमुनानगर की रहने वाली शरीर से 100 फीसदी दिव्यांग मोनिका शर्मा की है. वो निरंतर परिश्रम करते हुए उच्च शिक्षा हासिल कर चुकी हैं. अब इसी के आधार पर उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नायब सैनी से सार्वजनिक रूप से मदद की अपील करते हुए रोजगार की मांग की हैं.
8 साल की उम्र से थी गंभीर बीमारी
मोनिका का जन्म यमुनानगर शहर के कांसापुर स्थित रामनगर में 28 जनवरी 1986 को हुआ था. जब वह 8 साल की थी तब गंभीर बीमारी के चलते उसका पूरा शरीर पैरालाइज से ग्रस्त हो गया. जिसके कारण उसके दोनों हाथ- पांव काम नहीं करते और कुछ समय के लिए तो उसकी आवाज भी चली गई थी. तब से उसका परिवार संघर्षों से जूझ रहा है.
मोनिका के पिता राजकुमार प्राइवेट नौकरी पर है. इसी से उनका गुजारा होता है. फिर भी उन्होंने बड़े अस्पतालों में मोनिका के इलाज पर बहुत खर्चा किया. जैसे- तैसे बहुत इलाज के डेढ़ साल बाद मोनिका की आवाज वापस आई लेकिन उसका शरीर पूरी तरह ठीक नहीं हुआ.
मुंह को बनाया सफलता की सीढ़ी
आवाज लौटने के बाद मोनिका ने अपनी पढ़ाई जारी रखी. उसे स्कूलों में बढ़ी कठिनाई से दाखिला मिलने के बाद मुंह से कलम पकड़कर सफलता की सीढ़ियों पर चलना शुरू किया. 10वी तथा स्नातक की परीक्षा के बाद परिवार की स्थिति को देखते हुए पढ़ाई छोड़ दी और मुंह में ब्रश पकड़कर पेंटिंग शुरू की. इन पेंटिंग के जरिए उसने ना केवल अपनी कला को पहचान बनाया बल्कि बेटी पढ़ाओ- बेटी बचाओ और पर्यावरण संरक्षण जैसे मुद्दों पर चित्र के जरिए संदेश भी दिया. उसकी इस कला के बदले उसे कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है.
सरकार उठाए कदम
मोनिका शर्मा का कहना है कि सरकार ने दिव्यांगों के लिए कई तरह की योजनाएं तो बनाई है लेकिन धरातल पर कोई खास असर नहीं दिखता. उसे अभी तक कोई सरकारी नौकरी नहीं मिली है. वह चाहती है कि उसकी योग्यता और क्षमता के अनुसार उसे नौकरी दी जाए ताकि वह अपने परिवार पर बोझ न बने. जैसे- जैसे मोनिका की उम्र बढ़ रही है उसे सहायता की जरूरत पड़ रही है. उसके पिता 66 वर्ष है उन्होंने ने भी सरकार से मदद की गुहार लगाई है.
