नई दिल्ली | राजधानी दिल्ली- NCR में सर्दियों के दौरान बढ़ने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) पराली जलाने की निगरानी का तरीका बदलने की तैयारी में है. अब खेतों में आग लगने की घटनाओं की संख्या के साथ यह भी आकलन किया जाएगा कि कितने क्षेत्र में पराली जली और आग की तीव्रता कितनी रही.
CAQM के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, आयोग पराली जलने के ‘Burnt Area’ यानी प्रभावित क्षेत्रफल को मापने के लिए एक स्पष्ट व्यवस्था तैयार कर रहा है. इसके जरिए सिर्फ आग की लोकेशन दर्ज करने के बजाय उसके वास्तविक प्रभाव का आकलन किया जा सकेगा.
उठे सवाल के बाद फैसला
पराली जलाने की घटनाओं की निगरानी में अभी मुख्य रूप से सैटेलाइट से मिलने वाले आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाता है. हालांकि हालिया रिपोर्ट और अध्ययनों में केवल घटनाओं की संख्या को पराली जलने की पूरी तस्वीर के लिए पर्याप्त नहीं माना गया है. दिसंबर 2025 में पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने बताया था कि 2021 की तुलना में पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं में 93 प्रतिशत और हरियाणा में 91 प्रतिशत की कमी आई है.
इसके विपरीत, iFOREST के एक अध्ययन में पराली जलने से प्रभावित क्षेत्र में कमी की दर इससे अलग बताई गई. रिपोर्ट के अनुसार पंजाब में जला हुआ क्षेत्र 2022 के 31,447 वर्ग किमी से घटकर 2025 में करीब 20,000 वर्ग किमी रह गया. हरियाणा में 2019 में 11,633 वर्ग किमी क्षेत्र में पराली जलने के मुकाबले 2025 में यह आंकड़ा 8,812 वर्ग किमी रहा.
आग की तीव्रता से तय होगी जिम्मेदारी
अधिकारी के मुताबिक नई व्यवस्था से यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि किसी स्थान पर कितनी मात्रा में पराली जली और आग का प्रभाव कितना बड़ा था. इससे अलग-अलग क्षेत्रों में पराली जलाने की वास्तविक स्थिति समझने के साथ संबंधित स्तर पर जिम्मेदारी तय करना भी आसान होगा. CAQM का यह बदलाव दिल्ली- NCR में सर्दियों के प्रदूषण से निपटने की तैयारियों का हिस्सा माना जा रहा है.
