ज्योतिष डेस्क | भगवान शिव के हाथ में दिखाई देने वाला त्रिशूल किसने बनाया था और इसके निर्माण के पीछे क्या कथा है, इसका उल्लेख पौराणिक ग्रंथों में मिलता है. मान्यता के अनुसार महादेव के इस दिव्य अस्त्र को देवताओं के शिल्पकार भगवान विश्वकर्मा ने तैयार किया था. खास बात यह है कि त्रिशूल के निर्माण की कथा सूर्य देव के प्रचंड तेज से जुड़ी हुई है. 17 सितंबर 2026 को विश्वकर्मा जयंती मनाई जा रही है. इस अवसर पर भगवान विश्वकर्मा के शिल्प और उनके द्वारा बनाए गए दिव्य अस्त्रों की कथा का भी विशेष महत्व है.
विष्णु पुराण के तृतीय अंश, अध्याय 2 में सूर्य देव और विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा से जुड़ी कथा मिलती है. संज्ञा का विवाह सूर्य देव से हुआ था, लेकिन उनका तेज इतना प्रचंड था कि संज्ञा उसे सहन नहीं कर पा रही थीं.
सूर्य देव के तेज से तैयार हुआ था त्रिशूल
संज्ञा ने अपनी परेशानी पिता विश्वकर्मा को बताई. इसके बाद विश्वकर्मा ने सूर्य देव की सहमति लेकर उन्हें अपने तक्षण यंत्र यानी शाण चक्र पर चढ़ाया और उनके तेज के कुछ हिस्से को छांट दिया. इससे सूर्य का प्रचंड रूप सहने योग्य हो गया. साम्ब पुराण के 14वें अध्याय के 23वें श्लोक में भी विश्वकर्मा द्वारा देवताओं के लिए अस्त्र तैयार करने का उल्लेख मिलता है. पौराणिक वर्णन के अनुसार सूर्य से निकले इसी दिव्य तेज का उपयोग कई शक्तिशाली अस्त्र बनाने में किया गया.
संतुलन का प्रतीक
भगवान विश्वकर्मा ने भगवान शिव के लिए त्रिशूल, कार्तिकेय के लिए अमोघ शक्ति, भगवान विष्णु के लिए सुदर्शन चक्र और गदा तैयार की. इसके अलावा, अन्य देवताओं के लिए धनुष और परशु जैसे अस्त्र भी बनाए गए. हिंदू धर्मशास्त्रों में शिव के त्रिशूल को केवल अस्त्र नहीं माना गया है. इसे तीनों लोकों के साथ सत्व, रज और तम तीनों गुणों के संतुलन का प्रतीक भी माना जाता है.
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