ज्योतिष डेस्क | गणेश चतुर्थी के दौरान घर से लेकर गणपति पंडालों तक एक आरती सबसे ज्यादा सुनाई देती है, ‘सुखकर्ता दुखहर्ता’. मराठी भाषा में रची गई इस आरती के बिना महाराष्ट्र में गणपति बप्पा की पूजा अधूरी सी मानी जाती है. आरती में भगवान गणेश के स्वरूप, उनकी महिमा और भक्तों के संकट दूर करने वाली शक्ति का वर्णन मिलता है. भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से चतुर्दशी तक गणपति उत्सव मनाया जाता है.
इस दौरान पूजा के बाद भक्त ‘सुखकर्ता दुखहर्ता’ आरती गाते हैं. लेकिन इसके पीछे की कहानी भी बेहद खास है. मान्यता के अनुसार, ‘सुखकर्ता दुखहर्ता’ की रचना समर्थ रामदास स्वामी ने की थी.
आरती की रचना
एक बार वह मोरगांव पहुंचे थे. यहां भगवान मोरेश्वर (गणेश जी) के स्वरूप के दर्शन करने के बाद वह भक्ति में डूब गए. इसी भाव में उन्होंने गणपति की यह आरती रची. बताया जाता है कि इसमें कुल सात पद हैं. आरती की शुरुआत में भगवान गणेश को सुख देने वाला और दुखों को हरने वाला बताया गया है. उनसे जीवन में आने वाले विघ्न और परेशानियां दूर करने की प्रार्थना की जाती है.
जानें अर्थ
आगे गणेश जी के सुंदर स्वरूप का वर्णन है. उनके माथे पर सिंदूर और चंदन, गले में मोतियों की माला और रत्नों से सजे मुकुट की शोभा बताई गई है. ‘जय मंगल मूर्ति’ के जरिए गणेश जी को शुभता प्रदान करने वाला देवता कहा गया है. आरती में माता गौरी के पुत्र गणेश को पीतांबर धारी, वक्रतुंड और संकट में भक्तों की रक्षा करने वाला भी बताया गया है. अंतिम भाव में कहा गया है कि सच्ची श्रद्धा और भक्ति के साथ गणेश जी की शरण में आने वाले भक्त पर उनकी कृपा बनी रहती है. इसी कारण गणेश उत्सव में ‘सुखकर्ता दुखहर्ता’ आरती का विशेष महत्व माना जाता है.
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