पैरोल नहीं इस नियम के तहत गुरमीत राम रहीम को मिली जेल से छुट्टी, जानिए क्या है यह नियम

चंडीगढ़ | गुरमीत राम रहीम को 21 दिन के लिए रिहा किया गया है. और आपने सुना होगा कि गुरमीत राम रहीम को 21 दिनों की पैरोल मिली है. मगर आपकी जानकारी के लिए बता दें कि उनको पैरोल नहीं फरलो के तहत 21 दिनों की छुट्टी मिली है. मीडिया में आपने सुना होगा कि उनको पैरोल के तहत 21 दिन की रिहाई मिली है. मगर यह बिल्कुल गलत है.

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इससे पहले गुरमीत राम रहीम को हॉस्पिटल में अपनी मां को देखने के लिए पैरोल मिली थी और पैरोल तभी मिलती है जब कोई कारण होता है. बिना कारण 21 दिनों की रिहाई मिलना यह पैरोल के नियमों में बिल्कुल भी नहीं है. गुरमीत राम रहीम ने इस बार कोई कारण नही बताया.अब आप सोच रहे होंगे कि फिर उनको कैसे छुट्टी मिली है.पैरोल में बिना कारण बताए छुट्टी मिलना संभव नहीं है. मगर फरलो में बिल्कुल मुमकिन है कि आरोपी बिना किसी कारण जेल से छुट्टी ले सकता है.आज हम आपको बताएंगे पैरोल और फरलो में क्या अंतर होता है.

किसे कहते हैं फरलो

फरलो एक तरह की छुट्टी की तरह है, जिसमें कैदी को कुछ दिनों के लिए रिहा कर दिया जाता है. फरलो की अवधि को कैदी की सजा और उसके अधिकार से छूट के रूप में देखा जाता है.

फरलो केवल सजायाफ्ता कैदी के लिए उपलब्ध है. फरलो आमतौर पर एक कैदी को दिया जाता है जिसे लंबे समय तक सजा सुनाई गई हो.इसका मकसद यह है कि कैदी अपने परिवार और समाज के लोगों से मिल सके.यह बिना किसी कारण के भी दिया जा सकता है.चूंकि जेल राज्य का विषय है, इसलिए प्रत्येक राज्य में फरलो के संबंध में अलग-अलग नियम हैं. उत्तर प्रदेश में फरलो का कोई प्रावधान नहीं.

पैरोल और फरलो के बीच अंतर

फरलो और पैरोल दो अलग-अलग चीजें हैं. इन दोनों का उल्लेख जेल अधिनियम 1894 में किया गया है.फरलो केवल दोषी कैदी के लिए उपलब्ध है. जबकि पैरोल पर चल रहे किसी भी कैदी को कुछ दिनों के लिए रिहा किया जा सकता है.

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इसके अलावा फरलो देने के लिए किसी कारण की जरूरत नहीं है. लेकिन पैरोल के लिए एक कारण होना चाहिए. पैरोल तभी मिलती है जब कैदी के परिवार में किसी की मौत हो जाती है, किसी की शादी खून के रिश्ते में हो जाती है या कोई और अहम वजह.एक कैदी को पैरोल से भी वंचित किया जा सकता है. पैरोल अधिकारी यह कहकर मना कर सकता है कि कैदी को रिहा करना समाज के हित में नहीं है.

पैरोल और फरलो कब उपलब्ध नहीं हैं?

सितंबर 2020 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पैरोल और फरलो के लिए नए दिशानिर्देश जारी किए थे. इसमें गृह मंत्रालय ने बताया था कि कब किसी को पैरोल और फरलो नहीं दी जाएगी :-

जिन कैदियों की उपस्थिति समाज में खतरनाक है या जिनके अस्तित्व से शांति और कानून-व्यवस्था भंग होने का खतरा है, उन्हें रिहा नहीं किया जाना चाहिए. ऐसे कैदी जो जेल की हिंसा से संबंधित अपराधों में शामिल हैं, जैसे हमला, दंगा भड़काना, विद्रोह करना या भागने का प्रयास करना, रिहा नहीं किया जाना चाहिए. डकैती, आतंकवाद से संबंधित अपराध, फिरौती के लिए अपहरण, मादक पदार्थों की तस्करी जैसे गंभीर अपराधों के दोषी या आरोपी कैदी को रिहा नहीं किया जाना चाहिए.जिन कैदियों को पैरोल या फरलो की अवधि पूरी करने के बाद उनकी वापसी के बारे में संदेह है, उन्हें भी रिहा नहीं किया जाना चाहिए.यौन अपराध, हत्या, बाल अपहरण और हिंसा जैसे गंभीर अपराधों के मामलों में, एक समिति सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए पैरोल या फरलो देने का निर्णय ले सकती है.

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Pravesh Chauhan
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मेरा नाम प्रवेश चौहान है. मीडिया लाइन में पिछले 4 वर्ष से काम कर रहा हूँ. मैंने पत्रकारिता में स्नातक की डिग्री हासिल की है.