चंडीगढ़ | पंजाब- हरियाणा हाई कोर्ट की तरफ से एक अहम फैसला सुनाया गया है. पंजाब हरियाणा हाई कोर्ट द्वारा अपना आदेश सुनाते हुए बताया गया कि अगर राज्य नियोक्ता एक कार्य के लिए अलग- अलग वेतन प्रदान करता है तो यह मनमर्जी का भेदभाव होगा जिससे कमजोर वर्ग के कर्मचारियों के लिए जीविका और स्वाभिमान के बीच समझौता करना मजबूरी हो सकती है.

एक ही काम के लिए असमान वेतन
जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ द्वारा बताया गया कि समान कार्य के लिए समान वेतन का सिद्धांत संविधान की मूल भावना में निहित है और यह उन मूल्यों को प्रदर्शित करता है जिन पर राज्य की व्यवस्था टिकी हुई है. राज्य की ओर से एक ही काम के लिए असमान वेतन देना मनमाना भेदभाव होगा और इससे कमजोर कर्मचारियों को बिना अपनी इच्छा के ऐसी स्थिति स्वीकार करनी होगी जहां उन्हें जीवनयापन और आत्मसम्मान में से एक सेलेक्ट होगा. कोर्ट के इस आदेश का पालन तीन माह में सुनिश्चित करना होगा.
याचिकाकर्ता ने चयन प्रक्रिया में लिया हिस्सा
कैथल में सहायक लाइनमैन और पारी परिचारक के 1100 पद भर्ती के लिए विज्ञापित हुए थे. याचिकाकर्ता ने सिलेक्शन प्रोसेस में हिस्सा लिया. सरकार के निर्देशों पर विभिन्न विभागों में कार्य कर रहे संविदा कर्मचारियों को या तो एक जनवरी 2006 के बाद नियुक्त नियमित कर्मचारी के प्रारंभिक वेतन का 50 प्रतिशत या न्यूनतम वेतन अधिनियम, 1948 के तहत तय वेतन जो भी ज्यादा हो देने का प्रावधान किया गया है. ऐसे में कोर्ट द्वारा कहा गया है कि समान काम के लिए अलग- अलग वेतन देना मनमाना भेदभाव है.