झज्जर | हरियाणा सरकार (Haryana Govt) की प्रोत्साहन नीति की बदौलत आज सूबे के किसान परम्परागत खेती का मोह त्याग कर ऑर्गेनिक और बागवानी खेती को बढ़ावा दे रहे हैं, ताकि कम लागत में अधिक मुनाफा कमाया जा सकें. इसी कड़ी में झज्जर जिले का गांव रईया अब कृषि क्षेत्र में नया अध्याय लिखने जा रहा है. यहां के किसानों ने राजस्थान और गुजरात के मशहूर मसाला उत्पादन मॉडल को आधार बनाकर यहां पहली बार जीरा, सौंफ और अजवायन की वैज्ञानिक खेती शुरू की हैं.

मसालों फसलों की आएगी बहार
जिले के गांव रईया स्थित महाराणा प्रताप बागवानी विश्वविद्यालय के क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र में इन फसलों की शुरुआती जर्मिनेशन सफल रही है और वैज्ञानिक इसे किसानों की आमदनी बढ़ाने के बड़े अवसर के रूप में देख रहे हैं. यदि प्रयोग सफल रहा तो झज्जर इलाका मसाला फसलों का नया बेल्ट बन सकता है. इसके बाद, ये प्रदेश की खेती का मॉडल बनेगा.
केंद्र में पोली हाउस से सटी जमीन पर फव्वारा सिंचाई प्रणाली लगाई गई है, जिससे नियंत्रित नमी और पौधों की समान वृद्धि सुनिश्चित हो सके. वैज्ञानिक अब यह अध्ययन कर रहे हैं कि किन फसलों पर कौन- सी बीमारी कितनी पकड़ बनाती है और स्थानीय जलवायु में कौन- सी किस्म सर्वाधिक रोग प्रतिरोधी साबित होती है.
किसानों की बढ़ेगी आमदनी
विश्वविद्यालय प्रशासन और कृषि विशेषज्ञ लंबे समय से मसाला फसलों को झज्जर जिले में बढ़ावा देने के पक्षधर बने हुए थे. उनका कहना है कि जीरा, सौंफ और अजवायन कम सिंचाई में तैयार हो जाती है और इनका बाजार मूल्य हमेशा ऊंचा रहता है, जिससे लाभ पारंपरिक खेती की बजाय कई गुना ज्यादा मिलता है.
रईया केंद्र के वैज्ञानिकों ने बताया कि तीनों फसलें जीरा, सौंफ और अजवायन स्थानीय जलवायु में अच्छी तरह अनुकूल हो रही है और पौधों की वृद्धि सामान्य हैं. शुरुआती परिणाम उम्मीद जगा रहे हैं.
फसलों के पकने की अवधि
जीरा: 120- 130 दिन, उत्पादन जानने के लिए डेटा अध्ययन जारी है और शुरूआती संकेत काफी अच्छे हैं.
सौंफ: 140- 150 दिन, साढ़े 6 क्विंटल प्रति एकड़ उत्पादन.
अजवायन: 130- 140 दिन, उत्पादन 8-15 क्विंटल प्रति एकड़ (किस्म पर निर्भर).