नई दिल्ली | भारत सरकार 14 जुलाई को हाई- फ्रीक्वेंसी इकोनॉमिक बैरोमीटर लॉन्च करने जा रही है. उद्योग और व्यापार जगत ने इस पहल का स्वागत करते हुए इसे आर्थिक प्रशासन को अधिक आधुनिक, गतिशील और डेटा- आधारित बनाने की दिशा में बड़ा कदम बताया है. यह प्रणाली सरकार को अर्थव्यवस्था की वास्तविक समय (रियल टाइम) स्थिति समझने और तेजी से नीतिगत फैसले लेने में मदद करेगी. हाई- फ्रीक्वेंसी आर्थिक संकेतकों का उपयोग अमेरिका, चीन, ब्रिटेन, जापान और कनाडा जैसे विकसित देश पहले से कर रहे हैं.

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) भी देशों को आर्थिक नीतियों में सुधार के लिए ऐसे संकेतकों के इस्तेमाल की सलाह देता है. वहीं, विश्व बैंक गरीबी, महंगाई और व्यापारिक गतिविधियों का आकलन करने के लिए उपग्रह और मोबाइल डेटा जैसे आधुनिक संकेतकों का उपयोग करता है.
संगठनों ने किया स्वागत
दिल्ली के चांदनी चौक से सांसद एवं कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) के राष्ट्रीय महामंत्री प्रवीन खंडेलवाल के साथ-साथ फिक्की, एसोचैम और अन्य उद्योग संगठनों ने इस पहल का स्वागत किया है. प्रवीन खंडेलवाल ने कहा कि हाई-फ्रीक्वेंसी इकोनॉमिक बैरोमीटर जीएसटी संग्रह, यूपीआई लेनदेन, ई-वे बिल, माल ढुलाई, बिजली खपत, बैंकिंग गतिविधियों, डिजिटल कॉमर्स और अन्य प्रमुख आर्थिक संकेतकों के आधार पर अर्थव्यवस्था की वास्तविक समय की तस्वीर पेश करेगा. उनके अनुसार, इससे सरकार को त्वरित और सटीक नीति निर्माण में मदद मिलेगी तथा आर्थिक चुनौतियों की समय रहते पहचान कर आवश्यक कदम उठाए जा सकेंगे.
MSME को होगा फायदा
खंडेलवाल ने कहा कि इस पहल का सबसे बड़ा लाभ छोटे व्यापारियों, खुदरा विक्रेताओं, एमएसएमई इकाइयों और स्टार्टअप्स को मिलेगा. बाजार की मांग, उपभोक्ता व्यवहार और आर्थिक रुझानों की समय पर जानकारी मिलने से कारोबारी बेहतर व्यावसायिक निर्णय ले सकेंगे और उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ेगी. व्यापारिक संगठनों का मानना है कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, महंगाई, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और अंतरराष्ट्रीय संकट जैसे हालात में यह बैरोमीटर अर्ली वार्निंग सिस्टम की तरह काम करेगा. इससे सरकार समय रहते आवश्यक कदम उठा सकेगी और अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले संभावित असर को कम किया जा सकेगा.
मिलेगी मजबूती
कैट का कहना है कि हाई- फ्रीक्वेंसी इकोनॉमिक बैरोमीटर भारत की आर्थिक नीति निर्माण प्रक्रिया में नए युग की शुरुआत करेगा. इससे आर्थिक पूर्वानुमानों की सटीकता बढ़ेगी, निवेशकों का विश्वास मजबूत होगा, व्यापार को गति मिलेगी और विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिलेगी.