CSE रिपोर्ट में बड़ा खुलासा, दिल्ली- NCR बना देश का सबसे बड़ा ओजोन प्रदूषण हॉटस्पॉट

नई दिल्ली | देश के शहरों में जमीनी स्तर का ओजोन प्रदूषण अब केवल गर्मियों या कुछ घंटों तक सीमित नहीं रह गया है. पर्यावरण थिंक टैंक सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की नई रिपोर्ट में सामने आया है कि यह प्रदूषण अब पूरे साल बना रहने वाला गंभीर खतरा बन चुका है. बढ़ती गर्मी, तेज धूप और वाहनों व उद्योगों से निकलने वाली गैसों के रासायनिक प्रभाव के कारण ओजोन का स्तर लगातार बढ़ रहा है.

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रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली- एनसीआर देश का सबसे बड़ा ओजोन प्रदूषण हॉटस्पॉट बनकर उभरा है, जबकि उत्तर भारत के साथ-साथ दक्षिण और तटीय शहर भी इसकी चपेट में हैं.

CSE रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

रिपोर्ट के अनुसार, 2021 से 2026 के आंकड़ों के विश्लेषण में गर्मियों के दौरान चंडीगढ़ में ओजोन का औसत स्तर सबसे अधिक दर्ज किया गया. इसके बाद जयपुर और अहमदाबाद का स्थान रहा. वहीं दिल्ली और एनसीआर की स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक बताई गई है. अध्ययन के सभी 71 दिनों में यहां ओजोन का स्तर राष्ट्रीय मानक 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से ऊपर रिकॉर्ड किया गया. दिल्ली का पूसा, ग्रेटर नोएडा और गाजियाबाद सबसे बड़े हॉटस्पॉट के रूप में सामने आए. रिपोर्ट में ‘टॉक्सिक नाइट्स’ यानी रात में भी ओजोन के ऊंचे स्तर का नया खतरा सामने आया है.

ओजोन प्रदूषण हॉटस्पॉट

आमतौर पर ओजोन दिन में तेज धूप के दौरान बनता है, लेकिन अब यह रात में भी हवा में बना रहता है. रात के समय सबसे अधिक 46 बार खतरनाक स्तर दिल्ली-एनसीआर में दर्ज किया गया. इसके बाद बेंगलुरु में 14 और भोपाल में 13 रातों तक ओजोन का स्तर सुरक्षित सीमा से ऊपर रहा. विश्लेषण में यह भी सामने आया कि कई शहरों में ओजोन लंबे समय तक वातावरण में बना रहता है. भोपाल में औसतन 17 घंटे प्रतिदिन इसका स्तर सुरक्षित सीमा से ऊपर दर्ज किया गया. लखनऊ, मुंबई और बेंगलुरु में यह अवधि करीब 16 घंटे रही.

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तेजी से पिघल रहा ग्लेशियर

विशेषज्ञों के अनुसार, ओजोन प्रदूषण फेफड़ों पर सीधा असर डालता है. इससे अस्थमा और सांस संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ता है. लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से दिल का दौरा और स्ट्रोक जैसी गंभीर समस्याओं की आशंका भी बढ़ जाती है. इसका असर केवल इंसानों तक सीमित नहीं है. रिपोर्ट के मुताबिक ओजोन के कारण देश में हर साल गेहूं की पैदावार में करीब 14 से 15 प्रतिशत तक कमी आ रही है. साथ ही, यह प्रदूषण हिमालयी क्षेत्रों तक पहुंचकर ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने की वजह भी बन सकता है.

अब केवल धूल और पीएम कणों को नियंत्रित करना पर्याप्त नहीं होगा. राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) में मल्टी- पॉल्यूटेंट रणनीति अपनानी होगी. ओजोन को नियंत्रित करने के लिए वाहनों, उद्योगों और कचरा जलाने से निकलने वाली गैसों जैसे नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और वॉलेटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड पर प्रभावी नियंत्रण जरूरी है. इसके लिए राज्यों को साझा क्षेत्रीय कार्ययोजना के तहत मिलकर काम करना होगा- अनुमिता रायचौधुरी, कार्यकारी निदेशक, CSE

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Sanjucta Pandit
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मेरा नाम संयुक्ता पंडित है. मै हरियाणा ई खबर में बतौर कंटेंट एडिटर के पोस्ट पर लगभग 4 सालों से काम रही हूँ. मेरी हमेशा कोशिश रहती है आप लोगो तक ब्रेकिंग न्यूज़ जल्द से जल्द अपडेट करूं और न्यूज़ में कोई व्याकरण की गलती न हो.