हरियाणा विधानसभा चुनावों में पानीपत में दिखेगा त्रिकोणीय मुकाबला, कांग्रेस के गढ़ में 3 पंजाबियों में होगी कांटे की टक्कर

पानीपत | हरियाणा की पानीपत विधानसभा को कांग्रेस का गढ़ माना जाता है, लेकिन अबकी बार इस सीट पर त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिल सकता है. भारतीय जनता पार्टी (BJP)की तरफ से यहां फतेहचंद विज के दत्तक पुत्र यानि मौजूदा विधायक प्रमोद विज, कांग्रेस की तरफ से हुकुमत राय शाह के छोटे पुत्र एवं 5 बार विधायक रहे बलबीर पाल शाह के भाई वरिन्दर शाह उर्फ बुल्लेशाह को मैदान में उतारा है.

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ऐसा रहा है यहां का राजनितिक इतिहास

हरियाणा के गठन के बाद हुए 13 विधानसभा चुनावों में भाजपा को 2014 और 2019 में ही जीत मिली है. 1962 से लेकर अब तक 7 बार जनसंघ भाजपा के उम्मीदवार ने जीत हांसिल की है. फतेहचंद विज पांच चुनाव जीत चुके हैं. 2019 में उनके दत्तक पुत्र प्रमोद विज ने चुनाव जीता था. कांग्रेस पार्टी यहां से 6 चुनाव जीत चुकी है.

साल 1987, 1991, 2000, 2005 और 2009 में बलवीर पाल शाह ने यहां से जीत हासिल की थी. वहीं, साल 1972 में हुकुम राय शाह ने जीत हासिल की थी. साल 2014 के चुनाव में बीजेपी की तरफ से रोहिता रेवड़ी ने कांग्रेस के प्रत्याशी वरिंदर उर्फ बुल्ले शाह को बड़े अंतर से हराया था.

ऐसा है चुनावी माहौल

यहां के अगर वोट गणित की बात की जाए तो व्यापारी और उद्यमी वर्ग की संख्या बहुत ज्यादा है. इनमें वैश्य समाज के वोटर काफी संख्या में हैं. इन से जुड़ा मजदूर वर्ग भी है, इनमे प्रवासियों की संख्या बहुत ज्यादा है. कुल मिलाकर यह सारे वर्ग माहौल को किसी भी तरफ बनाने और बिगाड़ने का माद्दा रखते हैं. हालांकि, यह मतदाता किसका पलड़ा भारी करेंगे, यह चिंता तीनों प्रमुख प्रत्याशियों को सता रही है.

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BJP और कांग्रेस दोनों के लिए हैं चुनौतियां

यहां पंजाबी वोटर भी बहुतायत में है. भाजपा प्रत्याशी प्रमोद विज के लिए इस खेमे को साधना बड़ी चुनौती रहने वाली है. इसके अलावा, शहर में हैदराबादी बिरादरी के 15 से 20 हजार वोटर हैं. 2014 के चुनाव में इस बिरादरी के लोगों ने एक तरफ रोहिता रेवड़ी का साथ दिया था. यह वर्ग भी बीजेपी के लिए चुनौती साबित होने वाला है. ऐसी कुछ परिस्थितियों कांग्रेस के वरिंदर शाह के समक्ष भी हैं.

रोहिता के सामने भी हैं मुश्किलें

बात करें अगर रोहिता रेवड़ी की तो मुश्किलें उनके सामने भी हैं. पहली यह कि उनके पास किसी बड़ी पार्टी का सिंबल नहीं है. पार्टी के नाम पर जो वोट उन्हें पहले मिलती रही हैं. उनमें अब सेंध लगा पाना बड़ी चुनौती हो सकता है. साथ ही, साल 2014 के चुनाव में हैदराबादी बिरादरी ने उनका एक तरफा साथ दिया था, तब उस समय भाजपा की तरफ से उन्हें टिकट मिला था.

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Nisha Tanwar
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