चंडीगढ़ | पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने मेडिकल आधार पर सेना से बाहर किए गए जवानों के हित में एक राहत भरा फैसला सुनाया है. हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी जवान को सेवा अवधि के दौरान बढ़ी या गंभीर हुई बीमारी/ दिव्यांगता के कारण नौकरी से मुक्त किया जाता है तो केवल इस आधार पर उसे दिव्यांगता पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता कि उसकी दिव्यांगता 20% से कम आंकी गई थी.

हाईकोर्ट ने सुनाया ऐतिहासिक फैसला
हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT) द्वारा दिए गए दिव्यांगता पेंशन के आदेश को चुनौती दी गई थी. हाईकोर्ट ने कहा कि जब नौकरी से मुक्त किए जाने का वास्तविक कारण वही बीमारी या दिव्यांगता है, जो नौकरी के दौरान बढ़ी, तो केंद्र यह नहीं कह सकता कि संबंधित सैनिक दिव्यांगता पेंशन का पात्र नहीं हैं.
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकार यह साबित नहीं कर सकी कि संबंधित सैन्यकर्मी अपनी बीमारी के बावजूद बिना किसी रूकावट के नौकरी जारी रख सकता था.
पूर्व सैनिक से जुड़ा मामला
यह मामला एक पूर्व सैनिक से जुड़ा हुआ है जो नवंबर 1971 में भारतीय सेना में भर्ती हुआ था और सितंबर 1992 तक सेवा दी. सेवा से मुक्त किए जाने के समय उसे ‘हेपाटो-इन्टेस्टाइनल अमीबायसिस’ बीमारी से पीड़ित बताया गया और मेडिकल आंकलन में उसकी दिव्यांगता 15 से 19% के बीच आंकी गई, जो सामान्य 20% से नीचे थी. इसी आधार पर केंद्र सरकार ने दिव्यांगता पेंशन का विरोध करते हुए तर्क दिया था कि बीमारी न तो सैन्य सेवा से जुड़ी थी और न ही उससे बढ़ी थी.
इसपर हाईकोर्ट ने कहा कि जब रिकॉर्ड यह दर्शाता है कि बीमारी के कारण सैनिक सेवा जारी रखने में सक्षम नहीं था और उसे मेडिकल आधार पर बाहर करना पड़ा तो कानूनन उसे न्यूनतम 20% दिव्यांगता मानते हुए पेंशन का लाभ दिया जाना चाहिए.
हाईकोर्ट ने सुखविंदर सिंह मामले के सिद्धांत का हवाला देते हुए दोहराया कि यदि सेवा से बाहर किए जाने की वजह बनी दिव्यांगता 20% से कम भी आंकी गई हो, तब भी पेंशन के उद्देश्य से उसे न्यूनतम 20% माना जाएगा. हाईकोर्ट का यह फैसला पूर्व सैनिकों के अधिकारों की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण और लाभकारी माना जा रहा है.