नई दिल्ली | चॉकलेट खाना लगभग हर उम्र के लोगों को पसंद होता है लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि ज्यादातर चॉकलेट बार छोटे- छोटे चौकोर या आयताकार टुकड़ों में बनी होती हैं? आखिर कंपनियां इन्हें पूरी तरह सपाट क्यों नहीं बनातीं? दरअसल, यह डिजाइन आकर्षक दिखने के लिए के अलवाा विज्ञान, इंजीनियरिंग और उपयोगिता से जुड़ी कई अहम वजहों से जुड़ी हैं. विशेषज्ञों के अनुसार, हमारा दिमाग खाने की मात्रा का अंदाजा काफी हद तक उसकी बनावट और हिस्सों को देखकर लगाता है.

जब चॉकलेट अलग- अलग टुकड़ों में बंटी होती है, तो हर टुकड़ा खाने के बाद दिमाग को रुकने का संकेत मिलता है. इससे लोग एक साथ पूरी चॉकलेट खाने के बजाय सीमित मात्रा में ही खाते हैं और ओवरईटिंग की संभावना कम हो जाती है.
बंटी होती है चॉकलेट
चॉकलेट को परिवार और दोस्तों के साथ बांटना आसान बनाने में भी यह डिजाइन मददगार है. प्रत्येक चौकोर टुकड़ा लगभग बराबर आकार का होता है, इसलिए बिना किसी झंझट के सभी को समान हिस्सा मिल जाता है. माना जाता है कि 19वीं सदी में जब चॉकलेट आम लोगों तक पहुंचने लगी, तब इसे आसानी से बांटने के उद्देश्य से इस तरह का डिजाइन अपनाया गया. फैक्ट्री से दुकान तक पहुंचने के दौरान चॉकलेट को कई तरह के झटके सहने पड़ते हैं.
यदि पूरी चॉकलेट बिल्कुल सपाट होती, तो उसके अनियंत्रित तरीके से टूटने का खतरा अधिक रहता. बीच में बने खांचे और लाइनें दबाव को नियंत्रित करने में मदद करती हैं, जिससे चॉकलेट सुरक्षित रहती है और उसका आकार भी खराब नहीं होता.
तोड़ना मुश्किल!
चॉकलेट काफी सख्त होती है. यदि उसमें पहले से निशान न बने हों, तो उसे तोड़ना मुश्किल हो सकता है और वह किसी भी जगह से टूट सकती है. चौकोर ब्लॉकों के बीच बनी लाइनें एक तय ‘ब्रेक पॉइंट’ का काम करती हैं. हल्का दबाव देने पर चॉकलेट वहीं से टूटती है, जहां से उसे तोड़ना आसान होता है. इससे बिना चाकू के भी साफ और बराबर टुकड़े मिल जाते हैं. चॉकलेट के चौकोर डिजाइन का फायदा निर्माण प्रक्रिया में भी मिलता है. पिघली हुई चॉकलेट को सांचों में भरने के बाद छोटे- छोटे खांचों की वजह से वह जल्दी और समान रूप से ठंडी हो जाती है.
इससे हवा के बुलबुले बनने या दरार आने की संभावना कम रहती है. साथ ही, चॉकलेट को सांचे से निकालना भी आसान हो जाता है. हर बार का वजन व आकार लगभग एक जैसा रहता है.