चंडीगढ़ | हरियाणा सरकार द्वारा सूबे में जमीन की पैमाइश के लिए 30 करोड़ रुपए की धनराशि खर्च कर 300 जीएनएसएस रोवर्स मशीनें खरीदी गई थी लेकिन ये पिछले 3 साल से विभाग के स्टोर में धूल हांफ रही है. हैरानी की बात यह कि मशीनें खरीद ली गईं लेकिन इनके चलाने के लिए विभाग ने व्यवस्था नहीं की. नतीजा 3 साल से मशीनें स्टोर में पैक रखी हैं. GPS आधारित इन मशीनों के संचालन के लिए पटवारी और कानूनगो को कई बार प्रशिक्षण दिया गया लेकिन प्रशिक्षण के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति हुई. मशीनों का लाभ न किसान को मिला और न ही आमजन को.
मशीनों के संचालन में अड़चन का सबसे पड़ा कारण सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा मशीनों में भूमि का डेटा फीड न किया जाना बताया जा रहा था, लेकिन अब यह बहाना भी खत्म हो गया क्योंकि सर्वे ऑफ इंडिया काफी समय पहले मशीनों में भूमि का डेटा अपडेट कर चुका है.
तकनीकी ज्ञान से परे कानूनगो
जमीन की पैमाइश कानूनगो की मौजूदगी में होती है. ये तय है कि कानूनगो को रोवर्स मशीनों का संचालन किया जाना है. नाम न छापने की शर्त पर एक कानूनगो ने बताया कि प्रदेश में करीब 300 कानूनगो हैं. अधिकांश कानूनगो 10वीं और 12वीं पास हैं. अधिकांश को तकनीकी ज्ञान नहीं हैं.
जो लोग मशीनों की ट्रेनिंग देने आते हैं वह कानूनगो की समझ में नहीं आता. उनका मानना है कि वर्तमान में प्राइवेट आपरेटर डीजीएसपीआर मशीन का उपयोग करते हैं. इसके लिए राजस्व विभाग लाइसेंस जारी करता है. लाइसेंस के लिए मशीन संचालन में सिविल इंजीनियरिंग में डिग्री या डिप्लोमा आवश्यक होता है. ऐसे में कानूनगो मशीन से कैसे पैमाइश कर सकते हैं. इसके लिए डिग्री डिप्लोमा धारी ऑपरेटर रखें जाएंगे तभी मशीनों का संचालन हो सकेगा.
मशीनें बंद होने से नुकसान
- इलेक्ट्रॉनिक मशीनों की बैटरी और सेंसर 3 साल बंद रहने से खराब हो सकते हैं.
- अधिकांश मशीनों की वारंटी अवधि डिब्बे में बंद रहते ही खत्म हो गई है. फिर मरम्मत कैसे होगी.
- जो काम 1 घंटे में होना है, उसमें में पूरा दिन लग रहा है.
- प्राइवेट मशीनों से पैमाइश के नाम पर आमजन से 15 हजार से 20 हजार वसूले जाते हैं, फिर डेटा सहीं नहीं आता है.
आज भी पटवारी जरीब के भरोसे
इन मशीनों को हरियाणा लार्ज स्केल मैपिंग प्रोजेक्ट (एचएएलएसएमपी) के तहत खरीदा गया है ताकि जरीब (लोहे की चेन) से होने वाली पारंपरिक और त्रुटिपूर्ण पैमाइश को खत्म किया जा सके.
जमीनी विवादों को कम कर सटीक डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जा सके. पैमाइश की प्रक्रिया को ऑनलाइन और पारदर्शी बनाया जा सके लेकिन ये उद्देश्य पूरे होते दिखाई नहीं दे रहे हैं. पटवारी आज भी या जरीब के भरोसे हैं या फिर प्राइवेट मशीनों से पैमाइश करा रहे हैं. मशीनें संचालित होती तो आमजन की जेब पर कम बोझ पड़ता और समय की बचत देखने को मिलती.
