कुरुक्षेत्र | भारत सहित हरियाणा को आस्था और परंपराओं का देश कहा जाता है. यहां लगभग हर शहर और कस्बे में कोई न कोई प्राचीन मंदिर, तीर्थ या धार्मिक स्थल मौजूद है जहां सालभर श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रहती है. सुबह की आरती से लेकर शाम की पूजा तक मंदिरों में भक्तों की लंबी कतारें देखने को मिलती हैं. अधिकांश मंदिरों में श्रद्धालु फूल, नारियल, मिठाई या चुनरी चढ़ाकर अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं. कई जगहों पर प्रसाद चढ़ाने की विशेष परंपराएं भी देखने को मिलती हैं. यही विविधता भारत के धार्मिक स्थलों को खास बनाती है.
इसी आस्था की कड़ी में हरियाणा के कुरुक्षेत्र में स्थित एक मंदिर अपनी अलग परंपरा के लिए जाना जाता है. यहां भक्त देवी को फूल या मिठाई के साथ- साथ सोने, चांदी और मिट्टी के घोड़े अर्पित करते हैं. यह अनोखी परंपरा सदियों से चली आ रही है.
हरियाणा का अनोखा मंदिर
जी हां, बिल्कुल सही पढ़ा आपने… कुरुक्षेत्र में स्थित श्रीदेवीकूप भद्रकाली मंदिर उत्तर भारत के प्रसिद्ध शक्तिपीठों में गिना जाता है. इस मंदिर में मां भद्रकाली की पूजा की जाती है और यहां रोजाना बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं. मंदिर की सबसे अलग पहचान यहां की वह परंपरा है जिसमें भक्त देवी को घोड़े चढ़ाते हैं. कई श्रद्धालु अपनी मन्नत पूरी होने पर सोने या चांदी के बने घोड़े अर्पित करते हैं जबकि कुछ लोग मिट्टी के घोड़े चढ़ाते हैं.
52 शक्तिपीठों में से एक
यह परंपरा इतनी प्रसिद्ध है कि देश के कई हिस्सों से लोग यहां विशेष रूप से दर्शन करने आते हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह मंदिर 52 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है. पौराणिक कथा के मुताबिक, जब माता सती ने अपने पिता के यज्ञ में अपमानित होकर प्राण त्याग दिए थे, तब भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर शोक में ब्रह्मांड का भ्रमण करने लगे थे. कहा जाता है कि तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के कई टुकड़े कर दिए थे. जहां- जहां उनके अंग गिरे, वहां शक्तिपीठ स्थापित हुए.
मान्यता है कि कुरुक्षेत्र के इस स्थान पर माता सती का दायां टखना गिरा था जिसके कारण यहां शक्तिपीठ के रूप में देवीकूप भद्रकाली मंदिर की स्थापना हुई. यहां सालों भर भक्त अपनी मनोकामना लेकर पहंचते हैं.
महाभारत से जुड़ी परंपरा
इस मंदिर में घोड़े चढ़ाने की परंपरा का संबंध महाभारत काल से भी जोड़ा जाता है. मान्यता है कि पांडव ने महाभारत युद्ध से पहले मां भद्रकाली की पूजा की थी. कथा के अनुसार, पांडवों ने युद्ध में विजय मिलने पर अपने घोड़ों को देवी को अर्पित करने का संकल्प लिया था. युद्ध जीतने के बाद उन्होंने अपने सबसे सुंदर घोड़ों की जोड़ी देवी के चरणों में समर्पित की. तभी से इस मंदिर में घोड़े चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई जो आज भी श्रद्धालुओं के बीच प्रचलित है.
परंपरा आज भी कायम
समय के साथ कई चीजें बदलीं लेकिन इस मंदिर की आस्था और परंपरा आज भी बरकरार है. पहले जहां असली घोड़े चढ़ाए जाते थे, वहीं अब श्रद्धालु प्रतीक के रूप में सोने, चांदी या मिट्टी के बने घोड़े अर्पित करते हैं. मंदिर परिसर में ऐसे कई घोड़े दिखाई देते हैं जिन्हें भक्त अपनी मन्नत पूरी होने के बाद चढ़ाते हैं. आज भी देशभर से आने वाले श्रद्धालु यहां दर्शन कर अपनी मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करते हैं और पूरी होने पर घोड़ों की जोड़ी चढ़ाकर अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं.
