नई दिल्ली | राजधानी दिल्ली के भारतीय विमानन क्षेत्र को वैश्विक लॉजिस्टिक्स और ट्रांसशिपमेंट हब बनाने की दिशा में केंद्र सरकार की नई पहल के सकारात्मक नतीजे सामने आए हैं. नागरिक उड्डयन सुरक्षा ब्यूरो की ओर से शुरू किए गए ‘नो री- स्क्रीनिंग’ एयर कार्गो ट्रांसशिपमेंट के ट्रायल से दिल्ली एयरपोर्ट पर कार्गो परिवहन में समय और लागत दोनों की बचत हो रही है. 90-दिवसीय पायलट प्रोजेक्ट के तहत चेन्नई- दिल्ली- फ्रैंकफर्ट रूट पर 20 जून से इस व्यवस्था का परीक्षण किया जा रहा है.

शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक, इस रूट पर रोजाना कार्गो वॉल्यूम 2.2 टन से बढ़कर 4.5 टन पहुंच गया है. वहीं, दिल्ली एयरपोर्ट पर कनेक्टिंग फ्लाइट के लिए लगने वाला ट्रांजिट टाइम भी 36 से 48 घंटे से घटकर महज 5 से 8 घंटे रह गया है.
री- स्क्रीनिंग भेजा जा रहा माल
नई व्यवस्था में घरेलू शहरों से आने वाले अंतरराष्ट्रीय कार्गो को दिल्ली एयरपोर्ट पर दोबारा खोलकर पीस-लेवल री-स्क्रीनिंग की जरूरत नहीं होगी. यदि माल सुरक्षित यूनिट लोड डिवाइस यानी सीलबंद एयरलाइन कंटेनर में आता है, तो उसे बिना खोले सीधे अंतरराष्ट्रीय उड़ान में भेजा जा सकता है. पहले कस्टम और सुरक्षा जांच के चलते माल को खोलकर अलग-अलग पैकेट की जांच करनी पड़ती थी. इससे समय अधिक लगता था और सामान खराब होने या चोरी का जोखिम भी रहता था. इसी वजह से कई निर्यातक दुबई और दोहा जैसे विदेशी ट्रांसशिपमेंट हब का इस्तेमाल करते थे.
इन शहरों तक विस्तार
पायलट के सकारात्मक परिणामों के बाद अब अहमदाबाद, बेंगलुरु, हैदराबाद और मुंबई से आने वाले कार्गो को दिल्ली के रास्ते कोपेनहेगन, फ्रैंकफर्ट और लंदन (हीथ्रो) भेजने की प्रक्रिया का विस्तार किया जा रहा है. दिल्ली एयरपोर्ट के पास 95 से अधिक अंतरराष्ट्रीय कार्गो कारिडोर के जरिये सालाना 20 लाख मीट्रिक टन अतिरिक्त ट्रांसशिपमेंट संभालने की क्षमता बताई जा रही है. इससे भारतीय निर्यातकों की लागत घटने के साथ दुबई और दोहा जैसे विदेशी हब पर निर्भरता कम होने की उम्मीद है.