नई दिल्ली | मिडिल ईस्ट में तनाव का असर भारत देश के खेतों तक पहुंच गया है. खाद की सप्लाई पर संकट के बादल छाए हुए हैं. हालांकि, भारत सरकार भी इसको लेकर एक्टिव मोड में आ चुकी है और यूरिया खाद की उपलब्धता बनाएं रखने के लिए मास्टर प्लान तैयार किया है. मिली जानकारी के अनुसार, भारत सरकार द्वारा 25 लाख मीट्रिक टन यूरिया खाद की खरीदारी के लिए ग्लोबल टेंडर निकाला गया है.
खेती की रीढ़ यूरिया और डीएपी
दुनिया में सबसे ज्यादा यूरिया खाद भारत में आयात होता है. मिडिल ईस्ट के देशों से करीब 50% यूरिया और डीएपी खाद का आयात होता है, जिसमें सऊदी अरब सबसे बड़ा डीएपी सप्लायर और ओमान सबसे बड़ा यूरिया सप्लायर है. मिडिल ईस्ट में जारी जंग के चलते इस सप्लाई चेन पर सीधा प्रभाव पड़ा है.
सरकारी कंपनी इंडियन पोटाश लिमिटेड (IPL) ने शनिवार को टेंडर जारी किया. इसमें 15 लाख टन यूरिया पश्चिमी तट से और 10 लाख टन पूर्वी तट से मंगाने की योजना है. यह टेंडर इसलिए भी जरूरी है क्योंकि जून में मानसून की दस्तक के साथ धान, मक्का और सोयाबीन की बुवाई शुरू होती है और उस वक्त यूरिया की मांग एकदम से बढ़ जाती है.
भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल देश में खाद का पर्याप्त स्टॉक है. ग्रीष्मकालीन फसल सीजन के लिए करीब 3.9 करोड़ मीट्रिक टन खाद की जरूरत होगी और अभी स्टॉक 1.8 करोड़ टन के करीब है जो पिछले साल 1.47 करोड़ टन था. केमिकल्स और फर्टिलाइजर मंत्रालय ने बताया है कि भारतीय कंपनियों ने रूस, मोरक्को, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, मलेशिया, जॉर्डन, कनाडा, अल्जीरिया, मिस्र और टोगो जैसे देशों से लॉन्ग-टर्म डील साइन की हैं.
घरेलू उत्पादन में गिरावट
यहां चिंता वाली बात यह है कि अभी देश में यूरिया खाद का मासिक उत्पादन 18 लाख टन है जबकि सामान्य रूप से यह 24 लाख टन होता है. कुछ प्लांट सालाना मेंटनेंस के बाद अभी दोबारा चालू हो रहे हैं. बता दें कि यूरिया खाद बनाने के लिए LNG बेहद महत्वपूर्ण कच्चा माल होता है. इसकी 50% आपूर्ति मिडिल ईस्ट से पूरी होती है इसलिए उत्पादन में गिरावट देखने को मिल रही है. हालांकि, सरकार की ओर से कहा गया है कि बढ़ती ग्लोबल कीमतों के बावजूद किसानों को यूरिया और DAP सब्सिडाइज्ड रेट पर ही मिलता रहेगा.
