पानीपत | ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में जैवलिन थ्रो स्पर्धा में नीरज चोपड़ा ने सिल्वर मेडल अपने नाम किया है. नीरज ने दूसरे प्रयास में 85.83 मीटर की दूरी तय कर अपना सीजन बेस्ट थ्रो किया. श्रीलंका के रुमेश पथिराजे ने 89.75 मीटर के थ्रो के साथ गोल्ड जीता, जबकि भिवानी के यशवीर सिंह ने करियर बेस्ट 85.41 मीटर थ्रो कर ब्रॉन्ज मेडल हासिल किया.

नीरज के मेडल जीतते ही पानीपत के गांव खंडरा स्थित उनके घर पर जश्न का माहौल बन गया. दैनिक भास्कर से बातचीत में नीरज के पिता सतीश चोपड़ा ने कहा कि बेटे ने फिर देश की झोली में मेडल डाला है, इसकी खुशी है. हालांकि, गोल्ड की उम्मीद थी.
नीरज ने बताई वजह
उन्होंने गोल्ड से चूकने की दो वजहें बताईं, पहली वहां की तेज ठंडी हवा, जिसकी वजह से जिस खिलाड़ी ने पहला बेस्ट थ्रो किया, उससे आगे कोई नहीं निकल सका. दूसरी वजह बीते दिनों नीरज को लगी चोट रही. उन्होंने कहा कि हर बड़े मुकाबले में दबाव रहता ही है, फिर भी सिल्वर मिलना बड़ी खुशी की बात है. फाइनल में नीरज का प्रदर्शन उतार- चढ़ाव भरा रहा. पहले प्रयास में 80.97 मीटर, दूसरे में 85.83 मीटर, तीसरे में 81.29 मीटर और चौथे में 80.73 मीटर भाला फेंका. चौथे थ्रो के बाद वे खुद असंतुष्ट नजर आए. पांचवें- छठे प्रयास में भाला 80 मीटर से कम दूरी पर गिरता देख उन्होंने थ्रो रद्द कर दिए. दूसरे प्रयास के दम पर ही सिल्वर पक्का हुआ.
यशवीर सिंह
ब्रॉन्ज जीतने वाले यशवीर सिंह भी हरियाणा से हैं. उनका जन्म 22 अक्टूबर 2001 को भिवानी के देवसर गांव में हुआ. पिता राय सिंह नेशनल लेवल के जैवलिन थ्रोअर और रेलवे के रिटायर्ड कोच रहे हैं, दादा- चाचा भी हर्डल रेस में राष्ट्रीय पदक जीत चुके हैं. छोटा भाई उत्सव भी अंडर-18 जैवलिन थ्रोअर है. बता दें कि यशवीर का जिला मिनी क्यूबा कहलाता है, जो बॉक्सिंग के लिए मशहूर है. उनके गांव से जितेंद्र सिंह और मनीष कौशिक जैसे ओलंपियन मुक्केबाज निकले, लेकिन यशवीर के परिवार का रुझान हमेशा एथलेटिक्स की तरफ रहा.