हरियाणा में बहती है ‘सोने की नदी’! यहां रेत छानकर लोग निकालते हैं गोल्ड

यमुनानगर | हरियाणा के यमुनानगर में एक ऐसी नदी बहती है, जहां पानी और रेत के साथ- साथ सोना भी बहकर आता है. हिमाचल के पहाड़ों से बरसात की हर बूंद मिट्टी काटती हुई नीचे उतरती है और बोली नदी में पहुंचते- पहुंचते उसमें सोने के महीन कण घुल- मिल जाते हैं. इसी को छानकर सैकड़ों परिवार अपनी रोजी-रोटी चला रहे हैं. कभी एक दिन में डेढ़ ग्राम तक सोना हाथ लग जाता है, तो कभी लगातार कई दिनों तक खाली हाथ ही लौटना पड़ता है. हिमाचल प्रदेश और हरियाणा की सीमा पर बसे यमुनानगर जिले से होकर बोली नदी गुजरती है, जिसमें हिमाचल की तरफ से पानी बहकर आता है.

Yamunanagar Sona Ka Nadi

इसी पानी और रेत के साथ सोना भी नदी में बहता है और आसपास के ग्रामीण इसे निकालकर अपना गुजारा करते हैं. परिवार का पेट भरने के लिए वे जान जोखिम में डालकर यह मेहनत भरा काम करते हैं.

सोने की नदी

मानकपुर गांव के कारीगर नरेश कुमार बताते हैं कि जब से उन्होंने होश संभाला है, तभी से देख रहे हैं कि हिमाचल के पहाड़ों से पानी के साथ सोना बहकर बोली नदी में आता है. बरसात के मौसम में पहाड़ों से कटी मिट्टी पानी के साथ बहती है और उसी में प्रकृति के स्रोत से सोने के कण भी रेत में मिलकर आ जाते हैं. नरेश के मुताबिक, यह काम सीखने में सालों लग जाते हैं क्योंकि रेत के कण भी उतने ही चमकदार दिखते हैं जितना सोना, ऐसे में फर्क पहचानना आसान नहीं होता.

सीमावर्ती गांवों में करीब ढाई सौ लोग यह काम करते हैं, जिनकी बदौलत हजारों लोगों का घर चलता है. वे पिछले 35 साल से यह काम कर रहे हैं और बताते हैं कि यह उनकी चौथी या पांचवीं पीढ़ी है जो बोली नदी से सोना निकाल रही है. काम कम होने पर वे सोम, गंगा और सतलुज जैसी नदियों का भी रुख करते हैं.

मेहनत का काम

सोना निकालने की प्रक्रिया भी काफी मेहनत मांगती है. बरसात के बाद जब नदी का पानी घटता है तो रेत- बजरी किनारों पर जमा हो जाती है. कारीगर लकड़ी और लोहे के खास औजारों से किनारे की मिट्टी निकालकर लकड़ी की छोटी कश्ती में डालते हैं, जिस पर 3- 4 लोग मिलकर काम करते हैं. कश्ती पर लगी जालीदार संरचना से मिट्टी को घंटों पानी में साफ किया जाता है, जिसके बाद मुट्ठी भर काली रेत और सोना बचता है. इसे घर लाकर एक खास मसाले के साथ आग पर तपाया जाता है, जिससे मसाला जल जाता है और सोना पिघलकर एक जगह जमा हो जाता है, जिसे बाजार भाव पर बेचा जाता है.

टेंडर होता है जारी

करीब 15- 20 साल से यह काम कर रहे कारीगर संजीव कुमार बताते हैं कि उन्हें इसमें माहिर होने में 5 साल लगे थे. बरसात के 3 महीनों में उनका काम सबसे अच्छा चलता है, जब वे रोजाना करीब 1 ग्राम तक सोना निकाल लेते हैं. सबसे ज्यादा उन्होंने एक दिन में डेढ़ ग्राम तक सोना निकाला है. हालांकि, नदी में पानी बढ़ने पर कई बार खाली हाथ भी लौटना पड़ता है. सर्दियों की बरसात के बाद भी वे रोज तीन- चार रत्ती सोना आसानी से निकाल लेते हैं. बरसात के मौसम में यमुनानगर प्रशासन नदी से सोना निकालने के लिए टेंडर जारी करता है, जिसे ठेकेदार लेते हैं और फिर कारीगरों को काम की अनुमति देते हैं.

होती ही इतनी कमाई

पिछले सीजन में एक कश्ती के लिए 20 हजार रुपये तक चुकाए जाते है जिस पर 3- 4 लोग मिलकर काम करते हैं. एक व्यक्ति को रोजाना 1500 से 2000 रुपये तक की मजदूरी मिल जाती है. बरसात में यह काम बेहद जोखिम भरा हो जाता है क्योंकि पहाड़ों से अचानक तेज बहाव आने पर औजार और कपड़े बह जाते हैं. कई बार तो कारीगरों की जान पर भी बन आती है. फिर भी अपने पुश्तैनी काम को जिंदा रखते हुए वे सर्दी के मौसम में भी ठंडे पानी में घंटों बैठकर मेहनत करते हैं ताकि परिवार को दो वक्त की रोटी मिल सके. हालांकि, उनके बच्चे अब इस काम को आगे नहीं बढ़ाना चाहते फिर भी तीन दशक से ज्यादा समय से इसी में रचे- बसे ये कारीगर मजबूरी में जान जोखिम में डालकर यह काम करते आ रहे हैं.

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Sanjukta Pandit
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मेरा नाम संयुक्ता पंडित है. मै हरियाणा ई खबर में बतौर एडिटर के पोस्ट पर लगभग 4 सालों से काम रही हूँ. मेरी हमेशा कोशिश रहती है आप लोगो तक ब्रेकिंग न्यूज़ जल्द से जल्द अपडेट करूं और न्यूज़ में कोई व्याकरण की गलती न हो.