नई दिल्ली | साल 2009 में रिलीज हुई फिल्म दिल्ली- 6 का लोकप्रिय गीत ससुराल गेंदा फूल आज भी शादी- ब्याह और पारिवारिक समारोहों की पहली पसंद बना हुआ है. रेखा भारद्वाज की आवाज में गाए गए इस गीत ने देशभर में खूब लोकप्रियता हासिल की लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि यह गीत मूल रूप से छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति से जुड़ा हुआ है. दरअसल, ससुराल गेंदा फूल कोई नया गीत नहीं है. यह छत्तीसगढ़ के पारंपरिक लोकगीतों की विरासत का हिस्सा है. इसकी जड़ें दशकों पुराने छत्तीसगढ़ी लोक संगीत में मिलती हैं.

इस गीत को मूल रूप से गंगाराम शिवारे ने लिखा था जबकि इसकी धुन भुलवाराम यादव ने तैयार की थी. बाद में भुलवाराम यादव ने यह गीत जोशी सिस्टर्स रमा, रेखा और प्रभा जोशी को सिखाया. इन कलाकारों ने मंचों और रेडियो कार्यक्रमों के माध्यम से इसे लोकप्रिय बनाया, जिसके बाद यह गीत लोगों की जुबान पर चढ़ गया.
ससुराल गेंदा फूल
छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध रंगकर्मी और पद्मश्री सम्मानित हबीब तनवीर ने भी अपने नाटकों में इस लोकगीत को जगह दी. उनका नया थिएटर अक्सर छत्तीसगढ़ी लोकगीतों और लोककथाओं को मंच पर प्रस्तुत करता था जिससे इस गीत को और अधिक पहचान मिली. बॉलीवुड तक इस गीत की पहुंच भी एक दिलचस्प कहानी है. जब फिल्म दिल्ली- 6 बनाई जा रही थी तब अभिनेता और गायक रघुबीर ने यह लोकगीत संगीतकार A. R. Rahman को सुनाया. इसके बाद, गीतकार प्रसून जोशी ने इसके बोलों में कुछ बदलाव किए और इसे आधुनिक अंदाज में फिल्म के लिए तैयार किया गया. इस तरह छत्तीसगढ़ का एक लोकगीत बॉलीवुड का सुपरहिट गीत बन गया.
जानिए दिलचस्प सफर
यह गीत ददरिया शैली में गाया जाता है जिसे छत्तीसगढ़ी लोकगीतों का राजा कहा जाता है. ददरिया की खासियत यह है कि इसमें संवाद की शैली होती है जहां पुरुष और महिला पक्ष गीतों के माध्यम से अपने भाव व्यक्त करते हैं. कभी प्यार, कभी तकरार और कभी हल्के- फुल्के तंज के जरिए रिश्तों की भावनाओं को प्रस्तुत किया जाता है. गीत के मूल छत्तीसगढ़ी संस्करण में एक नवविवाहिता अपने ससुराल के अनुभवों का वर्णन करती है. सास, ननद और देवर जैसे रिश्तों के बीच होने वाली छोटी- छोटी नोकझोंक को बेहद सहज और रोचक अंदाज में पेश किया गया है.