हांसी | दिल्ली में स्नातक और एमए की पढ़ाई पूरी करने के बाद बैंकिंग क्षेत्र में नौकरी और फिर डिप्टी मैनेजर के पद तक पहुंची हरियाणा की रितु यादव को उसके परिवार ने सिर्फ शिक्षा और करियर में ही बराबरी का मौका नहीं दिया. शादी आई तो वर्षों से बेटों के लिए निभाई जाने वाली परंपरा भी बेटी के नाम कर दी. गांव चोरटापुर बाड़ा में रितु को घोड़ी पर बैठाकर बनवारा निकाला गया था.
रितु के पिता नरेन्द्र यादव सीआरपीएफ में जवान हैं. परिवार ने उसकी पढ़ाई में कोई कमी नहीं छोड़ी और उच्च शिक्षा के लिए दिल्ली भेजा. पढ़ाई पूरी करने के बाद रितु ने बैंकिंग क्षेत्र में अपना करियर बनाया और आगे बढ़ते हुए डिप्टी मैनेजर बनी.
हमेशा माना अपनी बेटी
रितु के ताऊ बलवंत प्रधान के दो बेटे हैं. उनके छोटे भाई नरेन्द्र के एक बेटा और एक बेटी है. बलवंत प्रधान बताते हैं कि अपनी बेटी नहीं होने के कारण उन्होंने रितु को हमेशा बेटी की तरह ही माना. परिवार में पहले से तय था कि उसकी शादी में भी वही खुशियां और रस्में होंगी, जो बेटे के विवाह में होती हैं. इसी सोच को परिवार ने 1 दिसंबर 2025 को हकीकत में बदला. गांव चोरटापुर बाड़ा में रितु घोड़ी पर सवार हुई और परिवार व ग्रामीणों की मौजूदगी में उसकी घुड़चढ़ी निकाली गई. आमतौर पर बेटों के विवाह में होने वाली बनवारे की रस्म बेटी के लिए निभाई गई.
शादी से तीन दिन पहले निकाला बनवारा
रितु की शादी 4 दिसंबर 2025 को गुरुग्राम के एक व्यवसायी के साथ तय थी. शादी से तीन दिन पहले 1 दिसंबर को परिवार ने घुड़चढ़ी निकालकर बेटी के विवाह की खुशियां मनाईं. इस पहल के पीछे परिवार की सोच साफ थी कि जब बेटी पढ़ाई और नौकरी में बेटों के बराबर आगे बढ़ सकती है तो विवाह की परंपराओं में उसके साथ फर्क क्यों हो. महीनों बाद भी चोरटापुर बाड़ा की यह पहल बेटा- बेटी को समान अवसर देने का संदेश दे रही है.
