हरतालिका तीज की पूजा से पहले जान लें ये रहस्य, वरना लंबी उम्र के दौरान हो सकती है प्रोब्लम!

ज्योतिष डेस्क | हिंदू धर्म में हरतालिका तीज को सुहाग और वैवाहिक सुख से जुड़ा महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है. इस दिन सुहागिन महिलाएं पति की लंबी उम्र और अखंड सौभाग्य की कामना से भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती हैं. वहीं कुंवारी कन्याएं मनचाहा और सुयोग्य वर पाने की इच्छा से यह व्रत रखती हैं. इस साल हरतालिका तीज 14 सितंबर को मनाई जा रही है.

Teej Puja

हरतालिका तीज की पूजा में मिट्टी से शिव- पार्वती की प्रतिमाएं बनाकर उनका पूजन करने की परंपरा है लेकिन इस पर्व के नाम को लेकर अक्सर सवाल उठता है कि इसे हरतालिका ही क्यों कहा जाता है.

हरतालिका नाम

‘हरतालिका’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है. इसमें ‘हरत’ का संबंध ‘हरण’ से और ‘आलिका’ का अर्थ ‘सखी’ से बताया गया है. हरतालिका का अर्थ हुआ ‘सखियों द्वारा हरण करना’. धार्मिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती की सखियां उन्हें लेकर वन में चली गई थीं, ताकि वह बिना किसी बाधा के भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए तपस्या कर सकें. इसी घटना के कारण व्रत का नाम हरतालिका पड़ा.

पार्वती ने की तपस्या

शिव पुराण में वर्णित कथा के अनुसार माता पार्वती भगवान शिव को अपने पति के रूप में स्वीकार कर चुकी थीं, लेकिन उनके पिता उनका विवाह विष्णु जी से करना चाहते थे. अपनी सखियों की मदद से पार्वती वन में चली गईं. वहां भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि और हस्त नक्षत्र में उन्होंने रेत से शिवलिंग बनाकर भगवान शिव की आराधना शुरू की. कथा के अनुसार माता पार्वती ने अन्न का त्याग कर दिया और 17 साल तक कंदमूल खाकर कठोर तपस्या की. उनकी साधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने दर्शन दिए और उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया. तभी से हरतालिका तीज को अखंड सौभाग्य और अच्छे जीवनसाथी की कामना से जुड़े व्रत के रूप में माना जाता है.

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ऐसे रखें व्रत

व्रत से एक दिन पहले महिलाएं मायके जाती हैं या वहां से सिंजारा भेजा जाता है, जिसमें सुहाग की सामग्री होती है. अगले दिन निर्जला व्रत रखकर शिव-पार्वती की पूजा की जाती है. तीसरे दिन स्नान के बाद माता पार्वती को सोलह श्रृंगार अर्पित करने के बाद पानी पीकर व्रत का पारण किया जाता है. धार्मिक मान्यता है कि विधि-विधान से पूजा करने पर भगवान शिव और माता पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त होता है.

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