फरीदाबाद | भारत दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक है, जिसकी संस्कृति और विरासत निराली है. यह देश अपनी वास्तुकला, कला और त्योहारों के साथ- साथ ऐतिहासिक धरोहरों के लिए भी प्रसिद्ध है. इन्हीं धरोहरों में हरियाणा का सूरजकुंड भी शामिल है, जो अपने प्राचीन इतिहास और अनूठी संरचना के कारण लोगों को हमेशा आकर्षित करता आया है.
वैदिक काल से ही रहा महत्वपूर्ण
वैदिक काल से ही हरियाणा महत्वपूर्ण रहा है. फरीदाबाद के सूरजकुंड का निर्माण 10वीं शताब्दी में राजा सूरजपाल ने सूर्य भगवान की भक्ति में किया था. यह कुंड सूर्य के आकार का है और ऐसा माना जाता है कि इसका नाम भी इसी से प्रेरित है. वर्तमान में पुरातत्व विभाग इस जगह की देखरेख कर रहा है. देश ही नहीं, बल्कि विदेश से भी लोग इसे देखने आते हैं.
धार्मिक महत्व
इस बारे में जानकारी देते हुए इतिहासकार एवं जेएनयू के प्रोफेसर दीप नारायण पांडे ने बताया कि राजा सूरजपाल दिल्ली और उत्तर भारत के कुछ हिस्सों पर शासन करते थे और हर रोज सूर्य भगवान की पूजा करते थे. इसके लिए उन्होंने कुंड के पास सूर्य देव का मंदिर भी बनवाया था, जो समय के साथ खंडहर में बदल गया है.
ऐसी भी मान्यता है कि सूरजकुंड में स्नान करने से चर्म रोग और कुष्ठ रोग जैसी गंभीर बीमारियां दूर हो जाती हैं. लगभग 6 एकड़ में फैले इस कुंड की नीचे के भाग की चौड़ाई 130 मीटर है. देखने में यह उगते सूरज जैसा प्रतीत होता है. कुंड के चारों ओर पत्थरों से बनी चौड़ी सीढ़ियां और बीच में खुला मैदान है, जो इसकी सुंदरता बढ़ाते हैं.
पर्यटकों को करता है आकर्षित
आज इस कुंड में पानी नहीं है और इसकी तलहटी में घास उग चुकी है, फिर भी यह हजारों पर्यटकों को आकर्षित करता है. यहां आने वाले भारतीय नागरिकों के लिए प्रवेश शुल्क 25 रुपये और विदेशी नागरिकों के लिए 300 रुपये निर्धारित किया गया है. यहां हर साल अंतरराष्ट्रीय हस्तशिल्प मेला आयोजित होता है, जिसमें देश और विदेश से हस्तशिल्प कलाकार व पर्यटकों आते है. अरावली पहाड़ियों के बीच बसे इस कुंड के चारों ओर का शांत वातावरण और पक्षियों की चहचहाहट इसे और भी खास बना देते हैं.
