सास- बहू की यह जोड़ी मचा रही है धमाल, आधुनिक तरीके से खेती कर हर साल कमा रहीं हैं लाखों रुपए

फतेहाबाद । आज के दिन सास- बहू के रिश्तों में पहले जैसी मजबूती भले ही ना रही हो लेकिन आज भी कुछ उदाहरण ऐसे हैं, जहां सास- बहू की जोड़ी ने किसी क्षेत्र में मजबूती से मोर्चा संभाला और सफलता के नए आयाम स्थापित कर दिखाएं. जी हां, आज हम यहां बात कर रहे हैं फतेहाबाद जिले के गांव भूथन खुर्द में एक सास- बहू की जोड़ी की, जिन्होंने अपने साहसिक निर्णय से न केवल खेती का तौर- तरीका बदला, बल्कि आज सालाना लाखों रुपए की आमदनी भी कर रही है.

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बहू अनीता जाखड़ ने सास चमेली देवी के साथ मिलकर तीन एकड़ भूमि पर लहसुन की खेती शुरू की थी जबकि अनीता के पति विनोद जाखड़ पंजाब के जालंधर में जमीन ठेके पर लेकर 7 एकड़ भूमि पर लहसुन की खेती की कमान संभाले हुए हैं. सास- बहू की जोड़ी ने खेत में खरपतवार निकालने से लेकर खाद- पानी देने तथा कीटनाशक दवाओं का छिड़काव करने तक हर जगह मजबूती से काम किया.

अब 15 दिन पहले ही मजदूरों की सहायता से लहसुन की खुदाई की है. तीन एकड़ में लगभग 150 क्विंटल लहसुन की बंपर पैदावार हुई है, जिसकी खुशी सास- बहू के चेहरे पर साफ नजर आ रही है. हालांकि सास चमेली देवी का कहना है कि अभी मंडियों में लहसुन का थोक भाव 35 रुपए प्रति किलो चल रहा है, जिसके चलते कुछ दिनों तक लहसुन को स्टॉक करके रखना पड़ेगा. उन्होंने अनुमान जताया है कि कुछ दिनों में लहसुन का थोक भाव 50 रुपए प्रति किलो तक हों जाएगा.

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दस सालों से कर रही है खेती

चमेली देवी ने बताया कि 14 साल पहले पति की अकास्मिक मौत होने पर घर की पूरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई थी. चमेली देवी अपने 10 एकड़ खेत में परम्परागत खेती तक ही सीमित थी लेकिन शिक्षित बहू अनीता जाखड़ ने अपनी सास के साथ मिलकर खेती करने का तौर तरीका ही बदल दिया. चमेली देवी ने बताया कि हर साल तीन से चार एकड़ भूमि पर लहसुन की खेती करते हैं, जिससे प्रति वर्ष लाखों रुपए की आमदनी हो जाती है.

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साल में तीन फसलें

अनीता जाखड़ ने बताया कि लहसुन की पैदावार लेने के तुरंत बाद मूंग की बिजाई कर देते हैं. मूंग की पैदावार लेने के बाद धान की खेती करते हैं. इस तरह एक साल में तीन फसलों से प्रति एकड़ तीन लाख रुपए से भी ज्यादा का मुनाफा कमा रहे हैं. उन्होंने बताया कि फसल विविधीकरण पद्धति से पैदावार भी अच्छी मिलती है और साथ ही फसलों में रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाओं का भी कम इस्तेमाल करना पड़ता है. फसल चक्र अपनाने से जमीन की उपजाऊ शक्ति भी बढ़ती है.

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