राजधानी दिल्ली की एक तस्वीर ये भी, ग्रामीण इलाकों की सच्चाई जानकर चौंक जाएंगे आप

नई दिल्ली | राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के पॉश इलाकों की चकाचौंध से हर कोई वाकिफ हैं लेकिन जब आप दिल्ली के गांवों की तस्वीर देखेंगे तो हैरान रह जाएंगे. वैसे तो इन गांवों को शहरीकृत गांवों का दर्जा प्राप्त है लेकिन ढांचागत सुविधाओं का अच्छा-खासा अभाव है. जितना विकास होना चाहिए था, उतना हुआ नहीं है.

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मिला कुछ नहीं, अलबत्ता गंवा बहुत कुछ दिया

शहरीकृत गांवों के दर्जे के एवज में ग्रामीण आबादी को मिला तो कुछ नहीं, अलबत्ता गंवा बहुत कुछ दिया. शहरीकृत गांव का तमगा मिलने के बाद गांवों से किसान और किसानी छिटक गई और बाहरी दिल्ली का सुल्तानपुर माजरा गांव इसका जीता-जागता उदाहरण है. चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है.

दिल्ली देहात की रिपोर्ट

बाहरी दिल्ली के ग्रामीण इलाके आज भी शिक्षा व स्वास्थ्य की बेहतर सेवाओं से महरूम हैं. महिला शिक्षा पर नजर डालें तो सिर्फ एक महिला कालेज है. बवाना में 1993 से संचालित अदिति कालेज आज भी स्कूल की इमारत में चल रहा है. ग्रामीण क्षेत्र के एकमात्र महिला कालेज के लिए आजतक जमीन फाइनल नहीं हो पाई है.

क्षेत्र में और कोई महिला कालेज नहीं होने के चलते लड़कियों को पढ़ने के लिए लंबी दूरी तय करते हुए बवाना आना पड़ता है. नरेला में महिला कालेज की स्थापना के लिए लंबे समय से मांग उठाई जा रही है लेकिन कोई काम नहीं हुआ. मामूरपुर गांव के लोगों ने महिला कालेज के लिए सालों पहले अपनी जमीन दान की थी लेकिन आज तक बिल्डिंग का ढांचा तैयार नहीं हो पाया है. वहीं, ग्रामीण क्षेत्र में लंबे समय से तकनीकी संस्थान खोलने की मांग भी बनी हुई है.

ट्रामा सेंटर की मांग

ग्रामीण क्षेत्र में नरेला और पूठ खुर्द में सरकारी अस्पताल हैं लेकिन दोनों अस्पताल रेफरल अस्पताल बन गए हैं. इस क्षेत्र में ट्रामा सेंटर खोलने की लगातार मांग उठाई जा रही है. हालांकि लिबासपुर में डेढ़ हजार बेड का अस्पताल निर्माणाधीन है.

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किसान के सामने कई परेशानियां

दिल्ली में किसान और किसानी सरकार की प्राथमिकता में नहीं है. ऐसे में इन लोगों को खाद-बीज के लिए हरियाणा का रूख करना पड़ता है. अन्य राज्यों के किसानों की तरह यहां के किसानों को सस्ती बिजली तो दूर की बात बल्कि कृषि सिंचाई कनेक्शन पर फिक्स चार्ज के नाम पर 1,000-1,200 रूपए का भुगतान करना पड़ता है. 10 किलोवाट बिजली कनेक्शन पर किसानों को इस राशि का भुगतान करना ही पड़ता है, भले ही उसने एक यूनिट बिजली खर्च ना की हों. टटेसर गांव के एक किसान ने बताया कि करीब चार साल पहले फिक्स चार्ज हटा दिया गया था लेकिन अब फिर से इसे थोप दिया गया है. वहीं, खेती के लिए दिल्ली का किसान ट्रैक्टर नहीं खरीद सकता है.

जल निकासी की नहीं है पुख्ता व्यवस्था

वहीं, जल निकासी की पुख्ता व्यवस्था नहीं होने के चलते दिल्ली देहात के गांवों का हाल स्लम बस्ती जैसा हो गया है. खासकर उत्तर- पश्चिमी दिल्ली के कई गांवों में जलभराव से हालात बेहद गंभीर हो रहें हैं. जलभराव से खेती करना भी मुश्किल हो जाता है.

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Ajay Sehrawat
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मेरा नाम अजय सहरावत है. मीडिया जगत में पिछले 6 साल से काम कर रहा हूँ. बीते साढ़े 5 साल से Haryana E Khabar डिजिटल न्यूज़ वेबसाइट के लिए बतौर कंटेंट राइटर के पद पर काम कर रहा हूँ.