नई दिल्ली | डिप्रेशन… आज की दुनिया में केवल एक शब्द ही नहीं है बल्कि एक ऐसी हालत है जिसमें इंसान बाहर से ठीक दिखता है लेकिन अंदर से टूट रहा होता है. अगर इसे बहुत आसान भाषा में समझा जाए, तो डिप्रेशन वह स्थिति है जब मन लगातार उदास रहने लगे, किसी चीज में दिल न लगे और जिंदगी बोझ जैसी लगने लगे. जब यह हालत कई दिनों या हफ्तों तक बनी रहती है तब यह रोजमर्रा यानी की डेली लाइफस्टाइल पर गहरा असर डालने लगती है. आमतौर पर इसे ही डिप्रेशन कहा जाता है. World Health Organization के मुताबिक, डिप्रेशन में इंसान को लगातार उदासी, ऊर्जा की कमी, नींद और भूख में बदलाव, ध्यान लगाने में परेशानी और कभी-कभी खुद को बेकार समझने जैसे भाव आने लगते हैं.
जी हां, आज की बदलती जीवनशैली में यह लगभग हर किसी को अपना शिकार बना रही है. जिसकी बहुत सारी मुख्य वजहें हैं, जिससे समय रहते आसानी से ऊबरा भी जा सकता है, लेकिन कई बार यह जानलेवा भी हो जाता है.
क्यों पड़ रहा असर?
आजकल के युवा जनरेशन फास्ट लाइफस्टाइल को अपनाने के चक्कर में पीछे अपने परिवार और दोस्तों को छोड़ देते हैं. काम और घर चलाने की चिंता, आने वाले जीवन को बेहतर बनाने के प्रयास उनसे धीरे-धीरे अकेलापन की ओर धकेल देते हैं. ऐसे में चिड़चिड़ापन, डिप्रेशन, एंग्जाइटी जैसी समस्याएं घेरने लगती है. कई दफा आपने लोगों से यह कहते हुए सुना होगा कि पहले के समय में डिप्रेशन कम था या कह सकते हैं कि इस तरह के शब्दों को लोगों ने सुना ही नहीं था. इसका एक बड़ा कारण हेल्दी जीवनशैली थी. पहले लोगों का जीवन सरल था. काम कठिन जरूर था लेकिन जीवन की रफ्तार धीमी थी. परिवार बड़े होते थे, लोग एक-दूसरे के साथ ज्यादा समय बिताते थे. दुख-सुख शेयर करने के लिए घर और समाज का सहारा था.
लेकिन अब ऐसा बिल्कुल भी नहीं है, परिस्थिति काफी विपरित हो चुकी है. हम पहले से ज्यादा जुड़े हुए दिखते हैं, लेकिन अंदर से ज्यादा अकेले हो गए हैं. मोबाइल, सोशल मीडिया और लगातार तुलना की आदत ने भी मन पर दबाव बढ़ाया है. हर किसी को लगता है कि बाकी लोग उससे ज्यादा खुश, ज्यादा सफल और ज्यादा आगे हैं. यह सोच धीरे-धीरे सेल्फ कॉन्फिडेंस को कम कर रही है. इससे दवाब और अकेलापन की स्थिति उत्पन्न हो रही है.
मेडिकल आंकड़ें हैं चिंताजनक
अगर आंकड़ों की बात करें तो यह सिर्फ किसी एक देश की समस्या नहीं है. दुनिया में करोड़ों लोग इससे जूझ रहे हैं. WHO के अनुसार, दुनियाभर में लगभग 28 करोड़ से ज्यादा लोग डिप्रेशन से प्रभावित हैं. भारत में भी स्थिति चिंताजनक है. रिपोर्ट के अनुसार 5 करोड़ से ज्यादा भारतीय डिप्रेशन से पीड़ित हैं. आम भाषा में समझे तो लगभग हर 20 में से एक व्यक्ति इस समस्या से गुजर रहा है. जी हां, संभावना है कि यह आंकडे आने वाले भविष्य में और भी बढ़ सकते हैं. वर्तमान की हालत को देखते हुए यह तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि आजकल की दुनिया बनावटी और दिखावटी हो चुकी है.
People living with chronic Neglected Tropical Diseases (NTDs) face significantly higher rates of depression, anxiety and suicidal behaviour than the general population and those with other chronic conditions — yet far too many still lack accessible, community‑based care and… pic.twitter.com/ljWixDdICL
— World Health Organization (WHO) (@WHO) January 30, 2026
डिप्रेशन के लक्षण
- बिना वजह लगातार उदासी महसूस होना
- पहले जिन चीज़ों में खुशी मिलती थी, उनमें दिल न लगना
- बहुत ज्यादा या बहुत कम नींद आना
- थकान और ऊर्जा की कमी
- खुद को बेकार या असफल महसूस करना
- ध्यान लगाने में कठिनाई
- भूख में बदलाव
- कभी-कभी जीवन खत्म करने जैसे विचार आना
लाइफ पर इतना होता है असर
डिप्रेशन सिर्फ मन की समस्या नहीं है. दरअसल, यह पूरी जिंदगी को प्रभावित करता है. इससे काम करने की क्षमता कम हो जाती है, रिश्तों में दूरी आ जाती है और कई लोग खुद को समाज से अलग करने लगते हैं. WHO के अनुसार, डिप्रेशन दुनिया में विकलांगता (Disability) का सबसे बड़ा कारणों में से एक है. सबसे गंभीर स्थिति तब होती है जब यह जान पर बन आए. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, दुनिया में हर साल 8 लाख से ज्यादा लोग अकेलेपन से तंग आकर अपनी जान गंवा देते हैं. इसका एक बड़ा कारण डिप्रेशन होता है.
डिप्रेशन की वजह
- पढ़ाई, नौकरी, करियर, पैसे हर चीज में प्रतिस्पर्धा पहले से ज्यादा हो गई है. लोगों को लगता है कि अगर वे पीछे रह गए तो जिंदगी खत्म हो जाएगी.
- सोशल मीडिया पर हम दूसरों की जिंदगी का हाइलाइट देखते हैं, उनका असली संघर्ष नहीं देखते. इससे हमें अपनी जिंदगी बेकार लगने लगती है.
- शहरों में लोग भीड़ में रहते हुए भी अकेले हैं. परिवार छोटे हो गए हैं, दोस्ती डिजिटल हो गई है. यह भी मुख्य रिजन है.
- कम नींद, ज्यादा स्क्रीन टाइम, फास्ट फूड और शारीरिक गतिविधि की कमी भी मेंटल हेल्थ को प्रभावित करती है.
- हमारी समाजिक सोच भी एक वजह है. बहुत लोग अपनी तकलीफ किसी से बताते ही नहीं, क्योंकि उन्हें लगता है कि लोग मजाक उड़ाएंगे या कमजोर समझेंगे.
मेडिकल टर्म्स
डिप्रेशन कमजोरी नहीं है दरअसल यह एक मानसिक स्वास्थ्य की समस्या है. जैसे शरीर को बीमारी होती है वैसे ही मन भी बीमार हो सकता है. फर्क सिर्फ इतना है कि शरीर का दर्द दिखाई देता है, मन का दर्द अक्सर छुपा रह जाता है. इसलिए जरूरी है कि हम अपनी भावनाओं को समझें, जरूरत पड़ने पर मदद लें और दूसरों को भी सुनें. कभी-कभी सिर्फ किसी का साथ, एक सच्ची बातचीत और थोड़ी समझ भी किसी की जिंदगी बचा सकती है.
