2 June ki Roti: किसके भाग्य में होती है ‘दो जून की रोटी’, जानिए इस कहावत का क्या है अर्थ

नई दिल्ली | आप में से बहुत लोगों ने ‘दो जून की रोटी’ (2 June Ki Roti) वाली कहावत सुनी होगी और बहुत से लोगों को इसका मतलब भी नहीं पता होगा! वैसे हम आपको बता दें कि आज दो जून है. और आज के दिन सोशल मीडिया पर ‘दो जून की रोटी’ वाले जोक्स और कहावतों का भंडार लगा हुआ है. इन कहावतों में कोई यह बताता है कि आखिर दो जून की रोटी कमाना कितना मुश्किल है, तो कोई यह बताता है कि वे बहुत भाग्यशाली हैं कि वे दो जून की रोटी खा पा रहे हैं. अब आपको मन में बार – बार यही सवाल आ रहा होगा कि आखिर यह ‘दो जून की रोटी’ है क्या? तो ज्यादा सोचिए मत क्योंकि हम आपको बताएंगे कि आखिर इसका मतलब क्या है और किन लोगों के भाग्य में यह रोटी होती है.

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Roti

क्या है दो जून की रोटी का अर्थ?

‘दो जून की रोटी’ की कहावत का अर्थ केवल तारीख नहीं है, बल्कि दो जून का मतलब वक्त से है. बता दें कि अवधि भाषा में वक्त को जून भी बोला जाता है. ऐसे में इसका मतलब दो समय यानी कि सुबह और शाम की रोटी/भोजन से है. दरअसल, ‘दो जून की रोटी’ का वाक्य उत्तर भारत में काफी लोकप्रिय है और दो जून की तारीख आते ही लोग इस कहावत को तारीख से जोड़कर जोक्स और कहावतें शेयर करने लगते हैं. जिनमें से कुछ ऐसे हैं – ”सभी से गुजारिश है कि आज के दिन रोटी जरूर खाएं, क्योंकि दो जून की रोटी बहुत ही मुश्किल से मिलती है.”

सबके भाग्य में नहीं ‘दो जून की रोटी’

हमारे देश में सरकार कई दशकों से गरीबी को मिटाने का काम कर रही है. इसके लिए कई योजनाएं भी बनाई गई. जिनमें करोड़ों-अरबों रुपये खर्च किए गए, लेकिन बावजूद इसके आज भी ऐसे कई लोग है, जिन्हें दो जून की रोटी तक नसीब नहीं होती है. एक सर्वे के अनुसार आज भी देश में ऐसे 19 करोड़ लोग हैं, जिन्हें सही तरीके से भोजन नहीं मिल पाता. उन्हें आज भी भूखे पेट ही सोना पड़ता है.

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किसान हमारे अन्नदाता

हमारा भारत कृषि प्रधान देश के लिए जाना जाता है, लेकिन यहां किसानों की आर्थिक स्थिति बहुत ज्यादा बेहतर नहीं है. किसान खेतों में कड़ी मेहनत करते हैं, घंटों हल जोतता है, तब जाकर अनाज पैदा होता है. जिससे लोगों का पेट भरता है. जिससे हमें ‘दो जून की रोटी’ नसीब होती है. इसके लिए हमें किसानों को धन्यवाद कहना चाहिए और सरकार को भी किसान की आर्थिक स्थिति बेहतर हो, इसके लिए एक बेहतर योजनाओं पर काम करना चाहिए. ताकि ‘दो जून की रोटी’ घर – घर पहुंचाने वाले अन्नदाताओं की आर्थिक स्थिति भी बेहतर हो सके.

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