कृषि क्षेत्र में क्रांति लाएगी टिशू कल्चर तकनीक, बिना मिट्टी- खाद गन्ने के एक टुकड़े से तैयार होंगे 30 हजार पौधे

हिसार | आधुनिकता के इस युग में कृषि क्षेत्र में ईजाद हो रही नई- नई तकनीकों ने खेती को आसान बना दिया है. कपास, धान, बाजरा, गन्ना, सरसों इत्यादि फसलों की नई किस्में ईजाद हो रही है, जिससे उत्पादन में वृद्धि हो रही है. इन किस्मों में रोग आने की संभावना भी बिल्कुल ना के बराबर है, जिससे किसानों को कीटनाशकों आदि पर होने वाले खर्च से छुटकारा मिला है. इसी कड़ी में चौधरी चरणसिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार से किसानों के लिए एक और अच्छी खबर सामने आई है.

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बिना मिट्टी- खाद के तैयार होंगे पौधे

कोई भी पौधा तैयार करने के लिए सबसे पहले मिट्टी की आवश्यकता होती है, लेकिन HAU के टिशू कल्चर लैब में कांच की बोतलों में बिना मिट्टी के पौधे तैयार हो रहे हैं. गन्ने का एक छोटा सा टुकड़ा, 6 से 9 माह तक प्रोसेस और 25- 30 हजार बीमारी रहित पौधे तैयार. सभी पौधे अनुवांशिक तौर पर एक समान, एक साथ विकसित होंगे और एक साथ उत्पादन देंगे.

चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार में 6.5 करोड़ की लागत से बनी प्रदेश की पहली सरकारी टिशू कल्चर लैब में गन्ने के साथ केला, ब्राह्मी, एलोवेरा, मुलेठी, स्ट्राबेरी आदि के पौधे तैयार करने के लिए कृषि वैज्ञानिक काम कर रहे हैं. यहां से हर साल विभिन्न किस्मों के लाखों पौधे तैयार हो सकेंगे. लैब इंचार्ज डॉ. अमित कौशिक ने बताया कि टिशू कल्चर से तैयार पौधे खेती के लिए किसी क्रांति से कम नहीं हैं.

उत्पादन में बढ़ोतरी

इन पौधों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि सभी पौधे एक जैसे होते हैं. इनमें कीट व रोग नहीं लगने से किसानों का दवाई छिड़कने का पैसा बचता है. फसल तैयार होने में भी समय कम लगेगा और उत्पादन भी अधिक होगा. इन पौधों को हम हरियाणा की जमीन के अनुसार तैयार कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि गन्ने की तीन से चार वैरायटी के पौधे हम किसानों को उपलब्ध कराएंगे. अभी प्रदेश में केले की फसल नहीं हो पाती, लेकिन हम जो पौधा तैयार कर रहे हैं वह यहां के वातावरण के अनुरूप होगा.

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क्या है टिशू कल्चर?

टिशू कल्चर एक तकनीक है. जिस फसल का पौधा तैयार करना होता है उसका एक टुकड़ा लेकर केमिकल से बैक्टीरिया व फंगस को दूर करते हैं. इसके बाद कांच की बोतलों में कृत्रिम मीडिया (जमा हुआ घोल, जो पौधे को पोषक तत्व देते हैं) में रखते हैं. 20 से 25 दिन बाद पत्ता फूटने के बाद पौधों को अलग-अलग करते हैं.

यह प्रक्रिया कई माह तक लगातार करते हैं. पौधे को जड़ें बनाने वाली मीडिया में रखते हैं. जड़ आने के बाद लैब के बाहर छोटे-छोटे ट्रे में शिफ्ट करते हैं. जिसे किसान लेकर खेतों में लगाते हैं. लैब में केले के 2.5 हजार तो एलोवेरा के 5 हजार पौधे होंगे. लैब में तैयार गन्ने के एक टुकड़े से जहां 30 हजार पौधे तैयार होंगे, वहीं केले के एक टुकड़े से 2.5 हजार, ब्राह्मी के 12 हजार, एलोवेरा के 2.5 हजार पौधे तैयार किए जाएंगे.

सेंटर फॉर माइक्रोप्रोपेगेशन एंड डबल हेपलोड लैब का मुख्य उद्देश्य कम समय में बीमारी रहित अधिक- से- अधिक पौधे तैयार करना है. इस लैब से किसानों को सीधे रूप से फायदा होगा. यहां से तैयार किए गए पौधे हरियाणा ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तर भारत के किसानों को उपलब्ध करवाए जा सकेंगे. प्रो. बीआर काम्बोज, कुलपति, HAU, हिसार

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मेरा नाम अजय सहरावत है. मीडिया जगत में पिछले 6 साल से काम कर रहा हूँ. बीते साढ़े 5 साल से Haryana E Khabar डिजिटल न्यूज़ वेबसाइट के लिए बतौर कंटेंट राइटर के पद पर काम कर रहा हूँ.