ज्योतिष डेस्क | हनुमान जी का जन्म केवल एक दिव्य बालक के आगमन की कथा नहीं है. इसके पीछे अंजना का संघर्ष, एक ऋषि का श्राप, 12 साल की कठिन तपस्या और भगवान शिव का आशीर्वाद जुड़ा हुआ है. हिंदू पौराणिक परंपराओं में हनुमान जी के जन्म से जुड़ी कई कथाएं मिलती हैं, जिनमें अंजना और राजा दशरथ के पुत्रकामेष्टि यज्ञ की कथा भी प्रमुख है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, अंजना पूर्व जन्म में पुंजिकास्थला नाम की अप्सरा थीं. वह देवराज इंद्र के दरबार की सुंदर अप्सराओं में शामिल थीं.

एक ऋषि के श्राप के कारण उन्हें स्वर्ग लोक छोड़कर पृथ्वी पर वानर रूप में जन्म लेना पड़ा. मान्यता है कि इस श्राप से मुक्ति की एक शर्त यह थी कि वह एक दिव्य बालक को जन्म देंगी, जिसका संबंध भगवान शिव से होगा.
अंजना पहले थीं अप्सरा
पृथ्वी पर जन्म लेने के बाद अंजना का विवाह वानरराज केसरी से हुआ. हालांकि उनका वैवाहिक जीवन सुखी था, लेकिन संतान न होने का दुख उन्हें परेशान करता था. अंजना जानती थीं कि एक दिव्य पुत्र के जन्म से ही वह अपने पुराने श्राप से मुक्त हो सकती हैं. इसी उद्देश्य से वह ऋषि मतंग के पास पहुंचीं. ऋषि ने उन्हें भगवान शिव की तपस्या करने की सलाह दी.
तपस्या के बाद मिले भगवान शिव
अंजना ने ऋषि के मार्गदर्शन में भगवान शिव की कठिन तपस्या शुरू की. मान्यता के अनुसार, उन्होंने 12 साल तक तप किया. उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए. अंजना ने ऐसे दिव्य पुत्र की कामना की, जो उन्हें श्राप से मुक्ति दिला सके. भगवान शिव ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली. हनुमान जी के जन्म की एक अन्य कथा का संबंध अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्रकामेष्टि यज्ञ से बताया जाता है. यज्ञ पूरा होने के बाद अग्निदेव ने दशरथ को दिव्य खीर प्रदान की थी, जिसे उन्होंने अपनी रानियों में बांट दिया.
एक प्रचलित कथा के अनुसार, इसी खीर का एक हिस्सा एक पक्षी उठाकर ले गया और तपस्या कर रहीं अंजना के हाथों में गिरा दिया. अंजना ने इसे भगवान की कृपा मानकर प्रसाद के रूप में ग्रहण किया. इस तरह भगवान शिव का आशीर्वाद, अंजना की तपस्या और दशरथ के यज्ञ की खीर की कथा आपस में जुड़ जाती है.
दिव्य बालक के रूप में हुआ जन्म
मान्यता है कि इसके बाद अंजना ने हनुमान जी को जन्म दिया. कई हिंदू परंपराओं में उन्हें भगवान शिव का अंश या रुद्रावतार माना जाता है. आगे चलकर हनुमान जी भगवान श्रीराम के परम भक्त, शक्ति, साहस, बुद्धि और विनम्रता के प्रतीक बने. नकी दिव्यता के पीछे केवल एक वरदान नहीं, बल्कि अंजना की वर्षों की तपस्या और भक्ति भी जुड़ी हुई थी. उनके जन्म के साथ ही अंजना के पूर्व जन्म के श्राप से मुक्ति की शर्त भी पूरी हुई.