पानीपत | हरियाणा प्रदेश का पानीपत शहर जो कि देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से महज 90 किलोमीटर की दूरी पर ही स्थित है. इतिहास की दृष्टि से देखा जाए तो पानीपत शहर को विशेष महत्व प्राप्त है. यह धरती कई बड़े ऐतिहासिक युद्ध की गवाह रही है. यहां पर एक ऐसा स्थान भी स्थित है, जहां इतिहास धर्म वीरता और पर्यटन का अद्भुत संगम देखने को मिलता है, जो महाभारत काल से जुड़ा हुआ है.

आज की इस खबर में हम आपको पानीपत के कुछ प्रमुख फेमस और ऐतिहासिक स्थलों के बारे में जानकारी देने वाले हैं. ना केवल पानीपत के स्थानीय लोग, बल्कि दूर- दूर से पर्यटक इन स्थानों पर घूमने के लिए आते हैं.
इब्राहिम लोदी का मकबरा
इब्राहिम लोदी का मकबरा पानीपत की पहली लड़ाई 1526 में हुई थी. उसके बाद, मुगल सम्राट बाबर ने दिल्ली सल्तनत के अंतिम सुल्तान इब्राहिम लोदी की कब्र को पानीपत में ही बनवाया था. ऐतिहासिक दृष्टि से यह मकबरा बेहद ही महत्वपूर्ण है. यह जगह न केवल लोधी के अंतिम विश्राम स्थल के रूप में जानी जाती है, बल्कि युद्ध और सत्ता परिवर्तन का प्रतीक भी इस जगह को माना जाता है. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की तरफ से इस मकबरे को संरक्षित भी घोषित किया जा चुका है.
बू अली शाह कलंदर की दरगाह
पानीपत में सूफी संत बू अली शाह कलंदर की दरगाह भी देखने को मिल जाएगी. इस दरगाह की सबसे खास बात यह है कि यहां पर हिंदू और मुसलमान दोनों समुदाय के लोग बिना किसी भेदभाव के आते हैं. कहा जाता है कि इस दरगाह पर जो भी मन्नत मांगी जाती है वह पूरी हो जाती है. इस संत का वास्तविक नाम शेख सरफुद्दीन था उनकी दरगाह को खिलजी के बेटों ने ही बनवाया था.
काला अंब
पानीपत की तीसरी लड़ाई की याद काला अंब दिलवाता है. यह भी एक ऐतिहासिक स्मारक है. यहां पर मौजूद एक काले आम के पेड़ की वजह से इसका नाम कल अंबर पड़ा है. कहा जाता है कि युद्ध में बहे खून की वजह से इस आम के पेड़ की पत्तियां काली हो गई थी. यह स्थान मराठा सैनिकों की बहादुरी और युद्ध के भयानक परिणाम की याद भी दिलाता है. इसे देखने के लिए भी देश के अलग- अलग हिस्सों से पर्यटक यहां पर आते हैं.
देवी मंदिर
पानीपत के धार्मिक स्थलों की बात की जाए, तो उसमें देवी मंदिर का नाम ना आए ऐसा तो हो ही नहीं सकता. यह शहर के बीचो- बीच एक बड़े तालाब के किनारे स्थित है. यह मंदिर अपनी आकर्षक वास्तु कला और शांत वातावरण के लिए ही जाना जाता है. पानीपत की तीसरी लड़ाई के लिए मराठा यहां आए थे और इस मंदिर का निर्माण करवाया था. इसी तालाब के किनारे देवी की एक मूर्ति मिली थी. सुबह होने पर मूर्ति उस स्थान पर वापस मिल जाती थी, जिसे प्रेरित होकर यहां पर मंदिर बनवाने का फैसला लिया गया था.
काबुली मस्जिद
पानीपत की पहली लड़ाई में इब्राहिम लोदी पर अपनी जीत की खुशी में मुगल सम्राट बाबर की तरफ से काबुली बाग मस्जिद का निर्माण करवाया गया था. इस मस्जिद का नाम बाबर की पत्नी मुसमत काबुली बेगम के नाम पर ही रखा गया था. इसका मुख्य द्वार एक बड़ा मेहराब है और इसके कोन अष्टबुझाकार हैं. यह स्थान न केवल ऐतिहासिक है, बल्कि उस युग की कला और संस्कृति को भी प्रदर्शित करता है.