मुंबई के 2 युवाओं का आया बिजनेस का गजब आइडिया, लोगों के फेंके जूतों से खड़ा किया करोड़ों का टर्नओवर

नई दिल्ली | आज हम मुंबई के दो युवाओं श्रीयांश भंडारी और रमेश धामी की सक्सेसफुल स्टोरी की बात करेंगे, जिन्होंने ऐसी चीजों से करोड़ों का कारोबार खड़ा किया, जिन्हें लोग कचरा समझकर फेंक देते है. उनकी कंपनी ग्रीनसोल आज पुराने और फेंके हुए जूतों को रिसाइकिल करके चप्पलें बनाते है. उन्होंने इसकी शुरुआत झुग्गी- बस्ती से की और अब उनका यह स्टार्टअप सलाना 2 से 3 करोड़ रूपए का टर्नओवर हासिल कर चुका है.

Shreyansh Ramesh

ऐसे आया बिजनेस का आइडिया

श्रीयांश भंडारी और रमेश धामी दोनो एथलीट थे. एक दिन श्रीयांश ने देखा कि रमेश धामी अपने पुराने जूतों को फेंकने के बजाय ठीक करने की कोशिश कर रहे है, क्योंकि जूते का सोल अभी भी मजबूत था. बस यहीं से उनके सफर की शुरुआत हुई. इसी घटना ने दोनों को सोचने पर मजबूर किया कि आखिर करोड़ों जूते हर साल कूड़े में क्यों चले जाते है. तब उन्होंने रिसर्च किया और उन्हें पता चला कि दुनिया भर में अरबों जूते लैंडफिल में फेंक दिए जाते है और उन्हें पूरी तरह खत्म होने में 200 साल से ज्यादा समय लगता है. इसी समस्या को समाधान में बदलने के लिए दोनों ने मिलकर स्टार्टअप किया.

झुग्गी बस्ती से शुरू हुआ सफर

दोनों के पास फुटवियर इंडस्ट्री का कोई अनुभव नहीं था, फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी. उन्होंने मुंबई की एक झुग्गी बस्ती में किराए की छोटी यूनिट लेकर काम शुरू किया. शुरुआत में वे एक दिन में सिर्फ 15 से 20 जोड़ी चप्पलें बना पाते थे, लेकिन राम फैशन एक्सपोर्ट्स के साथ पार्टनरशिप ने उनके लिए गेम- चेंजर का काम किया. उन्होंने एक ऐसी तकनीक विकसित की जिसमें पुराने जूतों को काटकर स्टैंडर्ड साइज दिया जाता है. उसमें करीब 20% नया मटेरियल जोड़कर उसे दोबारा उपयोग के लायक बनाया जाता है.

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20 राज्यों में फैला नेटवर्क

ग्रीन सोल का मॉडल केवल रिसाइक्लिंग तक सीमित नहीं है. यह कंपनी पुराने जूतों को इक्ट्ठा करती है, फिर उन्हें पूरी तरह खोलकर अलग- अलग हिस्सों में बांटती है. इसमें उपयोग सोल को और साम्रगी को साफ कर नई चप्पलों में बदला जाता है. ग्राउंड टीम गांवो और आदिवासी इलाकों में जाकर बच्चों के पैरों का माप लेती है, ताकि उन्हें सही फिटिंग की चप्पलें मिल सके. यह नेटवर्क भारत के लगभग 20 राज्यों तक फैल चुका है और 100 से अधिक कॉर्पोरेट कंपनियां CSR के जरिए इसमें सहयोग कर रही है.

विदेशों तक नेटवर्क पहुंचाने का लक्ष्य

यह कंपनी सिर्फ दान और सामाजिक काम ही नहीं, बल्कि कंपनी ने अपना रिटेल ब्रांड भी खड़ा किया है. यह इको – फ्रेंडली स्नीकर्स और एक्सेसरीज बेचती है. इस बिजनेस से उन्हें 3 करोड़ रुपए वार्षिक कमाई होती है. अब श्रेयांश और रमेश इस बिजनेस नेटवर्क को नेपाल, भूटान और अफ्रीका जैसे देशों तक पहुंचाना चाहते है. उनका लक्ष्य केवल जूते बनाना नहीं, बल्कि फुटवियर वेस्ट से रनिंग ट्रैक और अन्य पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना भी है.

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मेरा नाम अनीता पूनिया है. मैं पिछले 2 साल से मीडिया इंडस्ट्री में एक्टिव हूँ. वर्तमान मे Haryana E Khabar न्यूज वेबसाइट के लिए कंटेंट राइटर का काम कर रही हूँ.