हिसार | हरियाणा के हिसार की रहने वाली कीर्ति श्योराण ने फैशन जगत में एक अनोखी मिसाल कायम की है. पंजाब यूनिवर्सिटी (PU) में गेस्ट फैकल्टी के रूप में कार्यरत कीर्ति पिछले 8 वर्षों से छात्रों को फैशन डिजाइनिंग की बारीकियां सिखा रही हैं, लेकिन उनकी पहचान सिर्फ एक शिक्षक के रूप में नहीं, बल्कि एक इनोवेटर के रूप में भी बन चुकी है.
उनकी ‘कुकी डो तकनीक’ ने सस्टेनेबल फैशन में नई क्रांति ला दी है. इस तकनीक की खासियत यह है कि यह कपड़ों की बची हुई कतरनों को नए और स्टाइलिश परिधानों में बदलने का एक अभिनव तरीका है. इस खोज को भारत सरकार द्वारा कॉपीराइट प्राप्त हो चुका है.
कैसे काम करती है ‘कुकी डो तकनीक’?
फैशन इंडस्ट्री में हर दिन बड़ी मात्रा में कपड़ा बर्बाद होता है, जिसे आमतौर पर कचरे के रूप में फेंक दिया जाता है. कीर्ति ने इसी समस्या के समाधान के रूप में इसे विकसित किया।
- सबसे पहले कपड़ों की कतरनों को छोटे- छोटे टुकड़ों में काटा जाता है.
- इन टुकड़ों को सिलाई के जरिए एक साथ जोड़ दिया जाता है.
- इस प्रक्रिया से फ्रॉक, जैकेट, मिनी स्कर्ट जैसे ट्रेंडी और टिकाऊ परिधान बनाए जाते हैं.
- यह पूरी प्रक्रिया इको- फ्रेंडली है और जीरो- वेस्ट डिजाइनिंग को बढ़ावा देती है.
छात्रों और शिक्षकों का मिला समर्थन
कीर्ति की इस उपलब्धि में उनके सहयोगियों और छात्रों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा. उन्होंने बताया कि असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अनु गुप्ता और मास्टर ग्रेजुएट स्टूडेंट इशदीप सिंह ने इस तकनीक को विकसित करने में उनकी काफी मदद की. इशदीप को वे अपना “दाहिना हाथ” मानती हैं. इसके अलावा, विभाग के चेयरपर्सन डॉ. प्रदीप बराड़ ने भी हर कदम पर मार्गदर्शन दिया.
महिलाओं के लिए बनना चाहती हैं अवसर
कीर्ति श्योराण सेल्फ- हेल्प ग्रुप की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना चाहती हैं. वे अपनी वर्कशॉप के माध्यम से गृहणियों और जरूरतमंद महिलाओं को यह कला सिखाना चाहती हैं, ताकि वे भी अपने पैरों पर खड़ी हो सकें और आर्थिक रूप से मजबूत बन सकें.
