झज्जर | देशभर में मंदिरों को लेकर कई तरह की अनोखी परमपराएं है, जिन्हें आज भी लोग बखूबी निभाते आ रहे हैं. इसी तरह की एक मान्यता झज्जर शहर के बाबा प्रसाद गिरी मंदिर (Baba Prasad Giri Temple) से हैं, जहां पिछले 300 सालों से पंखे चढ़ाने की परम्परा चली आ रही है. यहां सोमवार के दिन श्रद्धालु मनोकामना मांगने के लिए आते हैं. फिर मनोकामना पूरी होने के बाद श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार पंखे चढ़ाने के लिए आते हैं.
बहुत पुराना है इतिहास
आचार्य उपेंद्र कृष्ण शास्त्री ने बताया कि शहर के श्री श्री 1008 सिद्ध बाबा प्रसाद गिरी मंदिर का इतिहास बहुत पुराना है. मंदिर के महंत बाबा प्रसाद गिरी महाराज जी के नाम पर इस मंदिर का नाम रखा गया था. उन्होंने बताया कि उस समय में बाबा प्रसाद गिरी महाराज की एक सेविका हुआ करती थी. उसके पति की मृत्यु हो जाने के पश्चात बाबा प्रसाद गिरी महाराज ने अपने प्राण उसके शरीर में डालकर खुद यहां पर जीवित समाधि ले ली थी. तभी से इस मंदिर में बाबा प्रसाद गिरी मंदिर की जीवित समाधि के पास पंखे चढ़ाने शुरू किए गए थे, क्योंकि उन्हें पंखे बहुत ही ज्यादा पसंद थे.
पहले यहां पर श्रद्धालुओं की तरफ से राजा- महाराजाओं के जमाने के हाथ के बड़े पंखे चढ़ाए जाते थे, लेकिन आज के समय में यहां पर हाथ के पंखों के अलावा छत पंखे, कूलर व एसी भी चढ़ाए जाते है. दूरदराज से श्रद्धालु यहां पर पंखों को चढ़ाने के लिए आते है. दुल्हेंडी के दिन बाबा प्रसाद गिरी मंदिर में पंखे चढ़ाए जाते है. इस दिन बाबा प्रसाद गिरी मंदिर में हजारों की संख्यां में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है.
समाधि की कहानी
एडवोकेट पंकज शर्मा ने बताया कि करीब 300 साल पहले इस मंदिर में बिमला नाम की एक सेविका रोजाना मंदिर में सेवाभाव के नजरिए से आती थी. उस महिला के पति फौज में थे. एक बार उनके पति फौज से छुट्टी आए हुए थे. इस दौरान पड़ोसियों ने उनके सामने उनकी पत्नी और बाबा प्रसाद गिरी महाराज के बारे में अनाप- शनाप बाते की. इस दौरान उनके पति की मौत हो जाती है, तो पड़ोसी ताना मारते हुए कहते हैं कि तुम्हारी वजह से ही तुम्हारे पति की मौत हुई है. इसके बाद, बिमला यह बात प्रसाद गिरी महाराज जी को बताती है.
बाबा प्रसाद गिरी महाराज उनको अपने पति की शव यात्रा को मंदिर के आगे से लेकर जाने के लिए कहते है. उसके बाद, बिमला घर जाकर यह बात बताती है तो परिवार वाले उसकी बात को स्वीकार कर लेते है. जब परिवार वाले उसकी शव यात्रा को मंदिर के आगे से लेकर जाते है, तो बाबा प्रसाद गिरी महाराज उनके शव को नीचे रखवाकर उनके ऊपर जल के छिड़काव व अपने चिमटे से उसको जीवित कर देते है और अपने बचे हुए प्राण उसके अंदर डाल देते है. इस दौरान धरती फटती है और बाबा प्रसाद गिरी महाराज उसमें समा जाते है.
इसके बाबा प्रसाद गिरी महाराज मंदिर के अंदर जीवित समाधि ले लेते है. सोमवार के दिन बाबा प्रसाद गिरी महाराज ने जीवित समाधि ली थी और उसी दिन दुल्हेंडी का भी पर्व था. इसके बाद से श्रद्धालु यहां पर सोमवार के दिन अपनी मनोकामना पूरी होने की मन्नत मांगने आते है और मन्नत पूरी होने के बाद यहां पर दुल्हेंडी के दिन पंखे चढ़ाए जाते है.
